ब्लॉगसेतु

Kajal Kumar
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 पोस्ट लेवल : मसाज massage trian रेल Rail ट्रेन
देवेन्द्र पाण्डेय
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दून में आज ग़ज़ब की भीड़ है। इसके चार घंटे पहले और दो घंटे बाद तक दूसरी बनारस जाने वाली कोई ट्रेन नहीं है। दिन में आने वाली दून, शाम छः बजे के बाद जफराबाद स्टेशन पर आई है। अपने को बैठने के लिए दरवाजे के पास वाली खिड़की मिल गई है। रोज का चलन भले खराब हो, अभी इसकी चा...
Khushdeep Sehgal
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अमृतसर दशहरा हादसे में जिन्होंने अपनों को खोया, वो भरपाई किसी जांच, किसी मुआवजे से पूरी नहीं होगी. लेकिन अपने अंदर झांक कर हम ये तो सोच ही सकते हैं कि परंपराओं के नाम पर ऐसे खतरे हम कब तक मोल लेते रहेंगे?अमृतसर में दशहरे पर जो हादसा हुआ, वो हर किसी को अंदर तक हिला...
Bharat Tiwari
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कहानी की कोमलता को लेखक भूल तो जाता है लेकिन वह यह नहीं जानता कि यह कोमल-तत्व घर की दाल के ऊपर तैरते जीरे की माफ़िक होता है...जो बाहर की दाल में नहीं दिखता, और जो बनावटी (या गार्निश का हिस्सा) कतई हो भी नहीं सकता. इंदिरा दांगी ने कहानी के कोमलपन को इतनी जतन से सम्हा...
देवेन्द्र पाण्डेय
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वे पतंजलि आश्रम हरिद्वार से अपने घर आरा लौट रहे थे। लगभग मेरी ही उम्र के थे लेकिन बीमारी ने उन्हें जीर्ण शीर्ण बना दिया था।  पेशाब की थैली में कैंसर था। कमर में दर्द था, अधिक देर तक बैठ नहीं पाते थे। बात करते करते बताने लगे कि तीन महीने पहले हम भी आपकी तरह ही...
देवेन्द्र पाण्डेय
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पूरे चालीस मिनट देर से चली पैसिंजर। जैसे सुबह सुबह मछुआरे जाल फैलाकर पकड़ने लगते हैं मछलियां वैसे ही ठीक सात बजे गमछा फैलाकर पूरे मन से #तास खेलते हुए लोहे के घर के साथी पकड़ रहे हैं दहला। इन्हें #ट्रेन लेट होने की कोई फिक्र नहीं। फिक्र कर के भी...
देवेन्द्र पाण्डेय
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दून में भीड़ है आज। पुरुलिया जिले के यात्रियों के जत्थे के बीच बैठा हूं। इनकी भाषा बांग्ला है। ये हरिद्वार, बद्रीनाथ, गंगोत्री, जमुनोत्री की तीर्थ यात्रा के बाद वापस अपने घर जा रहे हैं। इनके ग्रुप में लगभग पचास यात्री हैं। वेशभूषा और खान पान से गरीब मध्यमवर्गीय दिख...
देवेन्द्र पाण्डेय
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ढल चुके हैं सुरुज नरायण, गर्म है लोहे का घर। प्यासे हैं यात्री। व्याकुल हैं बच्चे। रुक-रुक, छुक-छुक चल रही है एक्सप्रेस #ट्रेन। बिक रहा है पानी ठंडा, मैंगो जूस, चना, खीरा। एक्सप्रेस ट्रेन पैसिंजर की तरह चले तो यात्री भले गर्म डिब्बे में आलू की तरह भुनाते चलें,...
देवेन्द्र पाण्डेय
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भारतीय रेल में सफ़र करते करते जिंदगी जीने के लिए जरूरी सभी गुण स्वतः विकसित होने लगते हैं। धैर्य, सहनशीलता, सामंजस्य आदि अगणित गुण हैं जो लोहे के घर में चंद्रकलाओं की तरह खिलते हैं। कष्ट में भी खुश रहने के नए नए तरीके ईजाद होते हैं। कोई तास खेलता है, कोई मोबाइल में...
देवेन्द्र पाण्डेय
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आज बनारस से छपरा रूट वाले लोहे के घर में बैठे हैं। सद्भावना सही समय पर चल रही है। इस रूट में भीख मांगने वाले बहुत मिलते हैं। अभी औड़िहार नहीं आया और चार भिखारी एक एक कर आ चुके। एक दोनों हाथ से लूला था, दूसरा रोनी सूरत लिए लंगड़ा कर चल रहा था, तीसरा अंधा था और चौथी...