ब्लॉगसेतु

डा. सुशील कुमार जोशी
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लिखना जरूरी है तरन्नुम में मगर ठगे जाने का सारा बही खाता हिसाब कौन जानता है सुर मिले और बन पड़े गीत एक धुप्पल में कभी यही बकवास आज ही के दिन हर साल ठुमुकता चला आता है पुराने कुछ सूखे हुऐ घाव कुरेदने फिर एक बार ये अहसासभूला जाता है ताजिंदगी ठगना खुदा तक को&...
Sanjay  Grover
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लोग ग़ौर से देख रहे थे।कौन किसका पंजा झुकाता है ? कौतुहल.....उत्तेजना......सनसनी....जोश.....उत्सुकता......संघर्ष....प्रतिस्पर्धा.....प्रतियोगिता.....ईर्ष्या......नफ़रत......जलन.....धुंधला ही सही, लोगों को कुछ-कुछ नज़र आ हा था क्यों कि हाथों में अलग-अलग रंगों के द...
अनंत विजय
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एक लंबे अर्से से हिंदी साहित्य में पाठकों की कमी का रोना रोया जाता रहा है । इस बात को हर सभा गोष्ठी में बहुत जोर शोर से रेखांकित किया जाता रहा है कि हिंदी साहित्य के पाठक घट रहे हैं, लिहाजा साहित्य पर बड़ा संकट आन पड़ा है । यह बहुत हद तक सही भी हो सकता है क्योंकि ब...
केवल राम
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आजकल जितने भी ऐसे छुटभये तैयार हुए हैं उनके कई तरह के नकारात्मक प्रभाव हमारे समाज और देश पर पड़ रहे हैं और जिस धर्म की आड़ में वह यह सब कुछ कर रहे हैं वह वास्तव में धर्म को स्थापित करने जैसा नहीं है, बल्कि भोले-भाले लोगों को अधर्म की तरफ ले जाने वाला मार्ग है. गतांक...
संजय भास्कर
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  सिनेमा पर तो थोड़ी बहुत लगाम है पर विज्ञापनों के मामले में टीवी बेलगाम है। टीवी को विज्ञापन चाहिएं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि विज्ञापन कैसे हैं। अच्छे या बुरे। समाज के हित में या अहित में। टीवी के मामले में कोई ठोस पॉलिसी नहीं होने की वजह से ही जागो ग्र...