ब्लॉगसेतु

ANITA LAGURI (ANU)
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तापस       मेरी डायरीयों के पन्नों में,       रिक्तत्ता शेष नहीं अब,       हर शुं तेरी बातों का         सहरा है..!   &...
Sanjay  Grover
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मज़े की बात है कि जब प्रशंसा में तालियां बजतीं हैं तब आदमी नहीं देखता कि तालियां बजानेवालों की भीड़ कैसे लोंगों के मिलने से बनी है !? उसमें पॉकेटमार हैं कि ब्लैकमेलर हैं कि हत्यारे हैं कि बलात्कारी हैं कि नपुंसक हैं कि बेईमान हैं कि.......लेकिन जैसे ही इसका उल्टा कुछ...
विजय राजबली माथुर
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 कश्मीरी पंडित सागरिका क़िस्सूकश्मीर डायरी/मशहूर पत्रकार और कश्मीरी पंडित सागरिका क़िस्सू का बयान वाया अरूण कौल...5 अगस्त 2019 कश्मीरियत के खत्म होने का आख़िरी दिनमैं सिडनी में रह रही हूँ और जहाँ हूँ वहाँ ख़ुश हूँ।कश्मीरी पंडित होने के नाते मेरा भी इस मामले मे...
वंदना अवस्थी दुबे
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”उत्सवी रंग में रंगा लंदन, इन दिनों पूरी तरह से एशियाई त्यौहारमयी हो जाता है. अपनी-अपनी पहचान और संस्कृति को बचाए रखने के पक्षधर लंदनवासी भारतीयों की श्रद्धा चरम पर नज़र आती है. रस्मो-रिवाज़ को पर्म्परागत तरीक़े से निभाने की इच्छा सर्वोपरि दिखाई देती है. परन्तु, इस सब...
Sanjay  Grover
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आज पूरा एक महीना हो गया जब मुझे पैरालिसिस का दूसरा अटैक हुआ था। एक हफ़्ते तक तो मैंने किसी को बताया ही नहीं। मुझे लग रहा था कि मैं ऐसे ही ठीक हो जाऊंगा। एक हफ़्ते बाद मेरी बहिन का फ़ोन आया तो मैंने बताया। डॉक्टर ने कहा कि अब तो कुछ नहीं हो सकता, उसी समय बताते तो ठीक ह...
kumarendra singh sengar
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अमूमन लेखों में कहानियों से रोचकता और प्रवाह देखने को नहीं मिलता है किन्तु शिखा वार्ष्णेय के लेखों में ये दोनों तत्त्व सहजता से दिखाई देते हैं. उनके देशी चश्मे से लन्दन को देखने का जो आनंद है वह अपने आपमें किसी मेले में घूमने जैसा है. उनके इन लेखों के द्वारा लन्दन...
kumarendra singh sengar
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डायरी लेखन किसी समय में अद्भुत और सशक्त विधा मानी जाती थी. आज उसकी क्या स्थिति है, कह नहीं सकते क्योंकि इसके बारे में अब पढ़ने को मिलता नहीं है. हम भी किसी समय डायरी लिखा करते थे. रोज के रोज उस दिन से सम्बंधित अपनी स्थिति के बारे में, उस दिन घटित घटनाचक्र के बारे मे...
Sanjay  Grover
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....तो मैंने कहा था मुझे पैदा करो.....आखि़र एक दिन तंग आकर मैंने पापाजी से कह ही दिया...उस वक़्त मुझे भी लगा कि मैंने कोई बहुत ही ख़राब बात कह दी है....कोई बहुत ही ग़लत बात....लेकिन यह तो मुझे ही मालूम है कि वो रोज़ाना मुझसे किस तरह की बातें कहते थे, कैसे ताने देते थ...
गौतम  राजरिशी
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एक और नया साल...उफ़्फ़ ! इस कमबख़्त वक्त को भी जाने कैसी तो जल्दी मची रहती है | अभी-अभी तो यहीं था खड़ा ये दो हज़ार अठारह अपने पूरे विराट स्वरूप में...यहीं पहलू में तो था ये खड़ा ! अचानक से जैसे पलकें झपकते ही अब दो हज़ार उन्नीस आ खड़ा हुआ है अपना विशाल सा मुख फाड़े | इतना...
गौतम  राजरिशी
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कितनी दूरी ! दूरी...कितनी दूर ! कितना दर्द कि बस उफ़ अब ! कितना शोर कि बहरी हों आवाज़ें और कितनी चुप्पी कि बोल उठे सन्नाटा ! कितनी थकन कि नींद को भी नींद ना आए...आह, कितनी नींद कि सारी थकन कोई भूल जाए ! कितनी उदासी कि खुशियाँ तरस जायें अपने वजूद को...कितनी खुशिय...