ब्लॉगसेतु

जन्मेजय तिवारी
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                        घर में आने वालों का ताँता लगा हुआ था । किसी के हाथ में गले में डालने के लिए फूलों की माला थी, तो किसी के हाथ में थमाने के लिए पुष्पगुच्छ । कोई चमकीले कागजों से आवरणबद्ध अपनी पस...
जन्मेजय तिवारी
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             ‘आप पत्रकार लोग भी तिल का ताड़ बनाने के उस्ताद होते हैं ।’ उन्होंने मुझे देखते ही ताना मारा ।   ‘पर आतंकवाद को आप तिल कदापि नहीं कह सकते । वह तो कब का ताड़ बन चुका है ।’ मैंने प्रतिवाद करने की कोशिश करत...