ब्लॉगसेतु

Khushdeep Sehgal
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एक दौर ऐसा था जब हर पोस्ट पर स्लॉग ओवर ज़रूर देता था...ब्लॉगिंग के सिलसिले में विराम आया लेकिन स्लॉग ओवर का मक्खन हर किसी को याद रहा...साथ ही उसकी पत्नी मक्खनी, बेटा गुल्ली और दोस्त ढक्कन भी...अब भी कई जगह से शिकायत मिलती रहती हैं कि मक्खन को कहां भेज दिया...&...
मुकेश कुमार
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ढक्कन सीवर काभीमकाय वजन के साथढके रहता है, घोर अँधेरे मेंअवशिष्ट ! बदबूदार !! उफ़ !!जोर लगा के हाइशा !खुलते ही, बलबलाते दिख पड़ेकीड़े-पिल्लू! मल-मूत्र!फीता कृमि ! गोल कृमि आदि भी !!रहो चिंतामुक्त !नहीं बैठेगी मक्खियाँ नाक परआज फिर 'वो' उतर चुका हैअन्दर ! बेशक है खाली...
मुकेश कुमार
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मेरे घर के कोने में पड़ानीले रंग का प्लास्टिक कासुन्दर सा बाल्टीनुमा डस्टबिनहै उसमे लीवर-सा सिस्टमताकि उसको पैर से दबाते हीलपलपाते घड़ियाल के मुंह के तरहखुल जाता है ढक्कन !!सुविधाजनक डस्टबिनसमेट लेता है हर तरह का कूड़ाजूठन/धूल/कागज़/और भीसब कुछ /  बहुत कुछबाहर से...