ब्लॉगसेतु

Sanjay  Grover
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लघुकथाकुछ सफल लोग आए कि आओ तुम्हे दुनियादारी सिखाएं, व्यापार समझाएं, होशियारी सिखाएं।और मुझे बेईमानी सिखाने लगे।अगर मुझे बचपन से अंदाज़ा न होता कि दुनियादारी क्या है तो मेरी आंखें हैरत से फट जातीं।-संजय ग्रोवर05-08-2019
Sanjay  Grover
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उनसे मैं बहुत डरता हूं जो वक़्त पड़ने पर गधे को भी बाप बना लेते हैं। इसमें दो-तीन समस्याएं हैं-1.     बाप बनना बहुत ज़िम्मेदारी का काम है। ऐसे ज़िम्मेदार बाप का दुनिया को अभी भी इंतेज़ार है जो सोच-समझ के बच्चा पैदा करे। वैसे जो सोचता-समझता होगा...
Sanjay  Grover
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इस फ़िल्म के बारे में आवश्यक जानकारियां आप इन दो लिंक्स् पर क्लिक करके देख सकते हैं -  1, IMDb   2. Wikipediaएक कोई लड़की है। कुछ गुण्डे हैं। उनके पास अच्छी, बड़ी-बड़ी गाड़ियां हैं। वे लड़की को उन्हीं गाड़ियों में उठा ले जाना चाहते हैं। वह जाना नहीं चाहती।...
Sanjay  Grover
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सभी नालायक एक-दूसरे को बहुत लाइक/पसंद करते हैं।एक जैसे जो होते हैं।वैसे वे किसी काम के हो न हों पर एक-दूसरे के बहुत काम आते हैं।मिलजुलकर भी अकेले सच से वे डरते हैं।अंततः एक दिन वे ख़ुदको श्रेष्ठ और अकेले सचको नालायक घोषित कर देते हैं।मज़े की बात यह है कि उसके बाद भी...
Sanjay  Grover
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ग़ज़लअक़्ले-बेईमां तुझे हुआ क्या हैअपनी नज़रों से छुप रहा, क्या है!मुझको ख़ुदसा बनाना चाहे है!ख़ुद तुझीमें, बता, तिरा क्या है ?पास जिनके रहन है तेरा ज़हनउनके बारे में सोचता क्या है ?हमने ठुकरा दिए जो सब ऑफ़रइसमें इतना भी चिढ़ रहा क्या है !हम हैं असली औ’ ज़िंदगी असलीफिर...
Sanjay  Grover
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व्यंग्यविश्वगुरु बनने का एक ही तरीक़ा है- दूसरे सभी देशों को अपने देश से भी बुरी स्थिति में ले आओ।इसके लिए आवश्यक है कि-दुनिया में ज़्यादातर देश खाने-पीने में मिलावट शुरु कर दें।किसी भी देश में बिना दहेज के लड़कियों की शादी न हो पाए।सभी देशों के लोग अच्छे काम करना बं...
Sanjay  Grover
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ग़ज़लख़ुदको फिर से खंगालते हैं चलो,आज क़ाग़ज़ संभालते हैं चलोगर लगे, हो गए पुराने-सेख़ुदको रद्दी में डालते हैं चलोक्यूं अंधेरों को अंधेरा न कहारौशनी इसपे डालते हैं चलोज़हन जाना तो मार डालोगेबात को कल पे टालते हैं चलोसुन न पाओगे, कह न पाएंगेएक फ़ोटो निकालते हैं चलो30-11-2...
Sanjay  Grover
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पुरस्कार लेनेवाले की कोई राय हो सकती है, देनेवाले की हो सकती है, लेन-देन और तमाशा देखनेवालों की राय हो सकती है, मगर पुरस्कार ! उससे कौन पूछता है तुम किसके पास जाना चाहते हो और किसके पास नहीं ? पुरस्कार की हालत कुछ-कुछ वैसी ही होती है जैसी तथाकथित भावुक समाजों में क...