ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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रात साढ़े दस बजे के बाद। छत पर टहलते हुए। एक हाथ से कान पर फ़ोन। दूसरे से नाक पोंछते हुए। दिल्ली की ठंड ऐसे ही हरबार इन दिनों में घेर लेती। इस बार भी कश्मीर में बर्फ़ गिरने के बाद से बढ़ गयी। वापस कमरे में लौट कर सोच रहा हूँ एक ख़त लिखने बैठ जाऊँ। तुम्हारी बहुत याद आ र...
Shachinder Arya
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कभी-कभी हम भी क्या सोचने लग जाते हैं। कैसे अजीब से दिन। रात। शामें। हम सूरज के डूबने के साथ डूबते नहीं। चाँद के साथ खिल उठते हैं। काश! यह दुनिया सिर्फ़ दो लोगों की होती। एक तुम। एक मैं। दोनों इसे अपने हाथों से बुनते, रोज़ कुछ-न-कुछ कल के लिए छोड़ दिया करते। कि कल मुड़...
Shachinder Arya
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कभी-कभी सोचता हूँ हम भाग कर शादी कर लेते तो क्या होता? मेरे पास आज तक नौकरी नहीं है। इन दोनों बातों में प्रश्न-उत्तर वाला संबंध नहीं है फ़िर भी दोनों एक-दूसरे का जवाब हैं। यह दोनों बातें आपस में ऐसे गुथी हुई हैं, जैसे तुम्हारी कल शाम वाली बँधी चोटियाँ। उनमें गुथे हु...
Shachinder Arya
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वह उस कमरे में साड़ी पहनकर खड़ी है। साड़ी कुछ घाघरे जैसी दिखती रही। जैसे कहीं राजस्थान या गुजरात में उसका घर हो। तस्वीर वह खुद भी थी और उसके पीछे दीवार पर भी एक और तस्वीर लगी हुई है। फ़ोटो बहाई मंदिर, लोटस टैम्पल, नेहरू प्लेस की है। शायद हम उन्ही की तस्वीरें लगाते हैं,...
Shachinder Arya
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कहानी में जबर्दस्त ट्विस्ट आन पड़ा था। वह फ़ेसबुक पर उनकी जितनी भी तस्वीरें देखता जाता, उतना ही उसे विश्वास होता जाता कि वह किसी दूसरी दुनिया से आए हुए लोगों की दुनिया है। उसकी ज़ेब में जितने पैसे नहीं होते उससे भी महँगी उन लाल-लाल होंठों को लाल करने वाली एक लिपिस्टिक...
Shachinder Arya
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तुम: अच्छा सोचो अगर आपको मुझे प्रपोस करना हुआ तो कैसे करेंगे?मैं: तुम्हें बहराइच के कचहरी रोड ले जाएंगे। लस्सी पिलएंगे। वहीं कह देंगे। जैसे लस्सी मीठी है वैसे हम दोनों अगर साथ हों तो ज़िंदगी भी खुशनुमा हो जाएगी। इसपर तुम या तो मुस्काती या अपना सैंडील निकाल मेरे सर प...
Shachinder Arya
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कितने दिन हो गए, इस घर नहीं आ पाया। अनकही बातों से ख़ुद को भरता रहा। सोचता रहा बस, मौका तो लगे, सब कह दूँगा। तुम्हारे कान के पास आकर। चुपके से लटों को हटाकर। उन होंठों को हल्के से छूकर। उँगलियों के खाली हिस्सों को भरते हुए। आहिस्ते से कुछ-कुछ न कहते हुए। आँखों में आ...
Shachinder Arya
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सच में कल रात की पोस्ट एक फ़िलर है। वहाँ जो कुछ भी लिखा है, वह पता नहीं क्या है? मन बस ऐसे ही बैठे रहने को था। तुम्हारा इंतेज़ार कर रहा था। तुम्हें बिन बताए। अचानक तुम्हारे पास पहुँच गया। वो दस बजकर पाँच मिनट वाली मिस कॉल के बाद तो जैसे नींद आई ही नहीं। उठकर नीचे आ ग...
Shachinder Arya
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कितना अच्छा होता न कि मैं यहाँ लिख रहा होता और बिलकुल इसी वक़्त तुम्हारी आँखों के सामने खुली किताब में वह दिखते जाते। एक-एक शब्द मेरी लिखाई में वहाँ छपता जाता। स्याही अभी सूखी भी न होती। इतनी तेज़ गति से वह तुम तक पहुँचते जाते। तुम उन्हे छूती तो लगता गाल छू रही हो। ब...
Shachinder Arya
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जब तुम अपनी आवाज़ में अपनी उदासी छिपा रही होती होमैं बिलकुल वहीं उसी आवाज़ में कहीं बैठा उदास हो रहा होता हूँ।इस तरह हम दोनों लगभग एक साथ उदास होने लगते हैं।इस उदास होने को हम किसी काम की तरह करतेहम दोनों इसी की बात करते कि उदास होने से पहले और उदास हो जाने के बाद हम...