एक रचना दिल्लीवालो *दिल्लीवालो! भोर हुई पर जाग न जानाघुली हवा में प्रचुर धूल हैजंगल काटे, पर्वत खोदेसूखे ताल, सरोवर, पोखर नहीं बावली-कुएँ शेष हैं हर मुश्किल का यही मूल है बिल्लीवालो!दूध विषैला पी मत जाना कल्चर है होटल में खाना सद्विचार कह दक़ियानूसी चीर-फाड़कर वस्त्र...
 पोस्ट लेवल : नवगीत दिल्लीवालो