ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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अभी जब से सो कर उठा हूँ, तब से पता नहीं किन अजीब-अजीब से ख़यालों से भर गया हूँ। कैसे इन विकृत से बेढंगे सवालों ने मुझे घेर लिया। ऐसा क्यों होता है, हम न चाहते हुए भी लिखने को मज़बूर हो जाते हैं। कहाँ खाली बैठा रहता। कुछ सोचता। कुछ बैठा रहता। सोचता भी शायद यही सब। या...
Shachinder Arya
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उसमें बहुत सारी चीज़ें या तो अपने आप गुम हो गई हैं या गुम कर दी गयी हैं। चीजों का न दिखना अकसर हमें ऐसा ही करता जाता है। लगता है, ऐसा बहुत कुछ था जो दिख नहीं रहा, उसे कौन कहेगा। मैंने ऐसा जान बूझकर नहीं किया। कभी हो जाता हो, तो पता नहीं। इसने कहीं से भी शहर को ढक नह...
Shachinder Arya
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ड्राफ़्ट में देखा तो तारीख़ आठ मार्च दो हज़ार तेरह की है। उसके साल भर पहले, आठ मार्च के दिनशहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्या  लिखी थी, तभी समझ गया था, स्त्री-पुरुष दोनों एकसाथ चलते हुए किसी भी निर्मिति को बनाते हैं। भले हम उसके अलग-अलग पाठ बनाते जाएँ, पर वह...
Shachinder Arya
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पुरानी दिल्ली, दरियागंज। किताबों की ज़िंदगी भी कैसी होती है। कभी ऐसा भी होता है, हम अचानक उस किताब तक पहुँच जाते हैं, जो इसी शहर में न जाने किसकी अलमारी में, मेज़ पर, कहीं अलगनी पर टंगे झोले में कब से पड़ी रही होंगी। फ़िर एक दिन आया होगा, जब उनकी कीमत मूल्य विहीन होकर...
Shachinder Arya
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खिड़की के बाहर बारिश की बूँदें लगातार छत पर गिर रही हैं। छत की फ़र्श पर नयी बूँद आते ही पुरानी बूँद अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में लग जाती है। उन सबको पता है, जब बौछार तेज़ हो जाएँगी तब इस संघर्ष का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। मौसम इतना पानी गिरने के बाद भी ठंडा न...
Shachinder Arya
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जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है,  हम वापस अपने अंदर लौटने लगते हैं जैसे। जैसे कहीं अनजानी जगह फँसे रहने का एहसास अंदर-ही-अंदर चुभता रहता है। कोई बहाना होता, जो वापस ले जाता। पर बहाना ऐसा, जब हम खुश हो सकें। खुश होकर ख़ुद को देख सकें। ऐसा न हो जब हम लौटकर वापस...
Shachinder Arya
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वह लोग एक ऐसे समय में जी रहे थे, जहाँ इस शहर के अलावे कहीं किताब लिखने वाले नहीं बचे थे। जिसे आना था, जिसे छपना था, उसे इस राजधानी आना पड़ता। यह मजबूरी कम सुविधा अधिक थी। यह उन सबका संगठित प्रयास था, जो लेखकों को यहाँ अपने आप खींच लाता। कोई भी होता उसे पिताजी मार्ग...
Shachinder Arya
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तबीयत अब ठीक है। वो जैसे ही मौसम बदलता है, सबसे पहले मुझमे दिखने लगता है। हम कभी कुतुब के बाहर बची रह गयी जगहों पर नहीं जा पाये। जमाली-कमाली भी उनमें से एक है और भी पता नहीं ऐसे कितनी जगहें होंगी कहाँ-कहाँ। फ़िर दिल्ली का यह मौसम तो माशा अल्लाह। इधर अप्रैल पिछली बार...
Shachinder Arya
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मेल से आई चिट्ठी जादा सबर और वक़्त मांगती है, लोग कहीं अरझे नहीं रहना चाहते होंगे। शायद इसलिए हमारी दुनिया इससे इससे बचती रही होगी। पर मुझे आश्चर्य है कि आप कैसे वहाँ तक पहुँच गईं कि मैं इतना लिखते हुए भी चुप्पा किस्म का हूँ? बहुत मानीखेज लगा मुझे। पता नहीं यह क्या...
Shachinder Arya
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दिल्ली हमारे सपनों का शहर। हम कभी सपनों में भी दिल्ली नहीं आपाते। अगर हमारी दादी ने हमारे पापा को बाहर पढ़ने के लिए भेजा न होता। तब यहाँ रहना तो दूर, इसे कभी छू भी नहीं पाते। हम दिल्ली रोज़ सुनते, पर कभी इसे देख नहीं पाते। हम भी वहीं चार-पाँच साल पहले तुमसे शादी और द...