ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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मुझे नहीं पता लोग कैसे लिखते हैं। पर जितना ख़ुद को जानता हूँ, यह लिखना किसी के लिए भी कभी आसान काम नहीं रहा। हम क्यों लिख रहे हैं(?) से शुरू हुए सवाल, कहीं भी थमते नहीं हैं। उनका सिलसिला लगातार चलता रहता है। पर एक बात है, जो इस सवाल का एक ज़वाब हो सकती है। वह यह कि ह...
Shachinder Arya
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जब हम सब खाना खा लेते हैं, तब सोचने लगता हूँ कि वह जल्दी से बर्तन माँज लें और हम दोनों हर रात कहीं दूर निकल आयें। हम दोनों की बातें पूरे दिन इकट्ठा होती गईं बातों के बीच घिरकर, झगड़ों के बगल से गुज़रकर सपनों के उन चाँद सितारों में कहीं गुम हो जातीं। हर रात ऐसा ही होन...
Shachinder Arya
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पता नहीं अंदर ख़ुद से कितने झूठे वादे कर रखे हैं।एक में हम शादी के बाद पहली बात अकेले घूमने निकलने वाले हैं। में सारी ज़रूरी चीजों में सबसे पहले कैमरे को संभालता हूँ। जिद करके उधार ही सही नौ हज़ार का डिजिटल कैमरा ले आता हूँ। कहीं पहाड़ पर जाएँगे, तब अपनी साथ वाली तसवी...
Shachinder Arya
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इधर सोचने बहुत लगा हूँ। पुराने दिनों पर घंटों सोचते हुए हफ़्तों बिता सकता हूँ। इतने दिन बिता देने की यह काबिलियत मुझमें अचानक घर नहीं कर गयी। यह मेरे ख़ून में है। क्योंकि मेरे ख़ून में इस मिट्टी की हवा नहीं है। पानी भी नहीं है। कुछ भी नहीं है। जिस-जिस के ख़ून में यहाँ...
Shachinder Arya
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बात तब की है जब फोटो खींचने वाले कैमरों से दोरंगी तस्वीरें ही निकला करती थी। हम तब पैदा भी नहीं हुए होंगे। पर अपने छुटपन से हम लकड़ी वाली अलमारी खोलते और बड़े आहिस्ते से एक एककर सारे एलबम निकाल लेते। धीरे-धीरे उन पुरानी यादों से अपनी पहचान बनाते। तब से लेकर आज तक...
Shachinder Arya
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तो उस सड़क पर कोई नहीं है। सिर्फ़ हम दोनों है। क्योंकि यह सपना हम दोनों का है। वह सड़क है भी या नहीं, पता नहीं। पर दिख सड़क जैसी ही रही है। हो सकता है हम जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे हों, वह पीछे से गायब होती हमारी आँखों में समाती जा रही हो। रात के कितने बज रहे हैं, पता न...
Shachinder Arya
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कितने दिन हो गए, इस घर नहीं आ पाया। अनकही बातों से ख़ुद को भरता रहा। सोचता रहा बस, मौका तो लगे, सब कह दूँगा। तुम्हारे कान के पास आकर। चुपके से लटों को हटाकर। उन होंठों को हल्के से छूकर। उँगलियों के खाली हिस्सों को भरते हुए। आहिस्ते से कुछ-कुछ न कहते हुए। आँखों में आ...
Shachinder Arya
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रात बारह बजकर एक मिनट। घंटी बजी। उधर से फ़ोन नहीं आया। तुम सो गयी हो। समझ नहीं पा रहा, नींद आ रही है या आँखें ऐसे ही भारी हो रही हैं। पलकें घंटा भर पहले भी ऐसी थीं और अभी भी ऐसी ही हैं। नींद गायब है। सपने में भी नहीं हूँ के तुम तक पहुँच जाऊँ। करीब से हम दोनों, एक...
Shachinder Arya
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सच में कल रात की पोस्ट एक फ़िलर है। वहाँ जो कुछ भी लिखा है, वह पता नहीं क्या है? मन बस ऐसे ही बैठे रहने को था। तुम्हारा इंतेज़ार कर रहा था। तुम्हें बिन बताए। अचानक तुम्हारे पास पहुँच गया। वो दस बजकर पाँच मिनट वाली मिस कॉल के बाद तो जैसे नींद आई ही नहीं। उठकर नीचे आ ग...
Shachinder Arya
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कितना अच्छा होता न कि मैं यहाँ लिख रहा होता और बिलकुल इसी वक़्त तुम्हारी आँखों के सामने खुली किताब में वह दिखते जाते। एक-एक शब्द मेरी लिखाई में वहाँ छपता जाता। स्याही अभी सूखी भी न होती। इतनी तेज़ गति से वह तुम तक पहुँचते जाते। तुम उन्हे छूती तो लगता गाल छू रही हो। ब...