ब्लॉगसेतु

विनय प्रजापति
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शायिर: अमीर अशरफ़ ख़ाँ 'हसरत' (खतौली)सरमाया-ए-हयात1 मुझे कुछ मिला तो हैमहफूज़ मुफ़लिसी में भी मेरी अना2 तो हैहमदर्द बनके आना अचानक मेरे क़रीबदर पर्दा इस ख़ुलूस3 में कोई दग़ा तो हैदुश्मन है सारा शहर तो इसका नहीं मलाल4मेरी मदद के वास्ते मेरा ख़ुदा तो हैहमदर्दियाँ नहीं तो...
विनय प्रजापति
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शायिर: मोहसिन नक़वीमन्ज़र यह दिलनशीं तो नहीं दिल ख़राश हैदोशे-हवा पे अब्रे-बरहना की लाश हैलहरों की ख़ामुशी पे न जा ऐ मिज़ाजे-दिलगहरे समन्दरों में बड़ा इरतिआश हैसोचूँ तो जोड़ लूँ कई टूटे हुए मिज़ाजदेखूँ तो अपना शीशाए-दिल पाश-पाश हैदिल वह ग़रीबे-शहरे-वफ़ा है कि अब जिसेतेर...
विनय प्रजापति
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शायिरा: असमा 'शब' आगराज़ख़्म दिल का मेरे तुम हरा मत करोबेरूख़ी से मिलो तो तुम मिला मत करोवह अगर भूल बैठा यह उसका ज़मीर उससे एक पल मुझे तुम जुदा मत करोमाँगने की तरह जब न माँगो दुआउसकी रहमत का भी तुम गिला मत करोदोस्तों से हमें मिला है यह सबक़दोस्त बनकर कभी तुम वफ़ा मत कर...
ganga dhar sharma hindustan
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अगर तू कहे तो ये काम कर दूँ ।नीलाम ख़ुद को बेदाम कर दूँ ।।ताजिंदगी गम न होगा कोई,जिंदगी ये तुम्हारे मैं नाम कर दूँ।। गंगा धर शर्मा "हिंदुस्तान"
विनय प्रजापति
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शायिर: बेदिल संभलीजब चमक उट्ठे तेरी याद के जुगनू कितनेख़ून बन-बनके गिरे आँख के आँसू कितनेग़मे-दौराँ, ग़मे-जानाँ, ग़मे-हस्ती ऐ दोस्तएक है जान मेरी और हलाकू कितनेवो जो बढ़-बढ़के बग़लगीर हुआ करता हैघोंप ही देगा मेरी पीठ में चाकू कितनेहक़ परस्ती की जहाँ में कोई क़ीमत ही...
विनय प्रजापति
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शायिर: अरूण साहिबाबादीपुरानी चीज़ों को इक दिन वह ख़ाक में मिलाता हैमगर इस ख़ाक से ही फिर नयी दुनिया बनाता हैउसे मीठा बनाकर बाँटता है सारी धरती परकि सूरज जितने पानी को समन्दर से उठाता हैउसे ठुकरानी पड़ती है सहर की नींद की लज़्ज़तवो सबसे पहले उठता है जो औरों को जगाता है...
विनय प्रजापति
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शायिरा: शिबली हसन 'शैल', इटावाघर से मेरे हर ख़ुशी निकलीज़िन्दगी तुझसे दुश्मनी निकलीदफ़अतन याद आ गया कोईमेरी आँखों में फिर नमी निकलीमैंने दामन पकड़ लिया उसकाग़म के साये में फिर ख़ुशी निकलीदोस्तों के उतर गये चेहरेमेरे होंटों से जब हँसी निकलीमुद्दतों बाद उसको भूली हूँदि...
अविनाश वाचस्पति
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तेजेन्‍द्र शर्मा का कहानी पाठमिल रहे हैं आपसुनेंगे हम उन्‍हेंआप हमें।दर्ज कर लेंअपनी उपस्थिति यहीं परन मालूम वहां पंजिकाआप तक पहुंच पायेया नहीं, या आप नपहुंच पायें रजिस्‍टर तक।आप वहां तक तो पहुंचेंगे, पूरा विश्‍वास हैयहां रजिस्‍टर के रूप मेंटिप्‍पणी बॉक्‍स हैयहीं प...
अविनाश वाचस्पति
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आतंक मचवा नेता लोकतंत्र की उड़ा रहे हैं खिल्लीराजधानी आतंक की बनी है मुंबई नहीं रही दिल्लीशेयर बाजार की फट गई निकली पतली है झिल्लीबंदर बिल्ली खेल में हारती रही हमेशा से है बिल्ली।
मुन्ना के पाण्डेय
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कभी-कभी कुछ गीत हमारे अंतर्मन को इतने गहरे छु जाते हैं कि उन्हें सुनते ही मन करता है कि बस समय रुक जाए और आँखें बंद करके खिड़की से ढलते हुए सूरज को की तपिश ली जाए.या फ़िर यूँ कि कमरे के अकेलेपन से निकल कर थोड़ा रिज़ की ओर चलें और थोड़ा नोश्ताल्जिक हो जाए वैसे इन गानों...
 पोस्ट लेवल : दिल से....