ब्लॉगसेतु

sanjiv verma salil
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नवगीत:संजीव.दिशा न दर्शनदीन प्रदर्शन.क्यों आये हैं?क्या करना है??ज्ञात न परचर्चा करना हैगिले-शिकायतशिकवे हावीयह अतीत थायह ही भावीमर्यादाओं काउल्लंघन.अहंकार केमारे सारेहुए इकट्ठेबिना बिचारेकम हैं लोगअधिक हैं बातेंकम विश्वासअधिक हैं घातेंक्षुद्र स्वार्थोंहेतु निबंधन....
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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नदी तुम माँ क्यों हो...?सभ्यता की वाहक क्यों हो...?आज ज़ार-ज़ार रोती क्यों हो...?   बात पुराने ज़माने की है जब गूगल जीपीएस कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी के नक़्शे दिशासूचक यंत्र आदि नहीं थे एक आदमीअपने...
Ravindra Pandey
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जो भी हो जाए कम है,क्यों तेरी आँखें नम हैं?देते हैं  ज़ख्म  अपनें,मिले गैरां से मरहम है।तू अपनी राह चला चल,पीकर अपमान हलाहल।या मोड़ दिशा हवाओं के,गर तुझमें भी कुछ दम है।न्याय सिसक कर रोए,अन्याय की करनी धोए.यहाँ झूठ, फ़रेब के क़िस्से,नित लहराते परचम हैं।नैतिकत...
Sanjay  Grover
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वामपंथी बायीं तरफ़ जाएं।दक्षिणपंथी दायीं तरफ़ जाएं। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({ google_ad_client: "ca-pub-9126168104576814", enable_page_level_ads: true...
विजय राजबली माथुर
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farmers lacked consciousness for socialism.PROLETARIAT NEVER BECAME THE RULING CLASS IN RUSSIA  :After revolution in Russia, Lenin committed several mistakes. One was nationalization of total land in one stroke. It was neither possible to take control of the w...
PRABHAT KUMAR
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बुद्धि की स्मृति में!   पशु प्रेम तो हममे से हर किसी को होता है यह बात अलग है कि वह पशु कौन है. जब आज मैनें समाचार सुना कि अमूल दूध के दाम में २ रूपये की बढ़ोत्तरी हुई तब मुझे विचार आया क़ि अपने इस लेख में मैं बुद्धि के बारे में जरुर प्रकाश डालूँ।  ...
PRABHAT KUMAR
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     बहुत सही वक्त था जब मैं शाम को घूमने निकला था, दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस में अच्छा समय बीता। अकेला था परन्तु अकेला घुमने का आनंद ही कुछ और होता है खासकर मेरे लिये। अच्छा मौसम था. गर्मी तो बहुत थी इसलिए अब तक प्यास भी लग गयी थी मैं पानी...
PRABHAT KUMAR
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विचारों की दिशा     आप सभी लोगों के स्नेह ने मुझे एक ऐसे विषय "विचारों की दिशा" पर लिखने को प्रेरित किया जिसका मन मैंने पिछले महीनों पहले बना लिया था और आज अचानक ही मुझे लगा अब तो शुरुआत कर ही देनी चाहये। विचार हर किसी के एक जैसे नहीं हो सकते इन...
राजीव कुमार झा
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आज के इस वैज्ञानिक युग में भी बहुत सी ऐसी बातें हैं,जो समाज में प्राचीन काल से प्रचलित रही हैं और अब भी अंधविश्वास की श्रेणी में ही गिनी जाती हैं.इन्हीं में से एक है – दिशाशूल.एक समय विशेष में दिशा-विशेष की यात्रा करने की बात को या मुहूर्त इत्यादि में विश्वास को आज...
 पोस्ट लेवल : दिशाशूल
केवल राम
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मैं जब भी कहीं दूर पहाड़ की चोटी की तरफ देखता हूँ तो मुझे उसमें कोई बदलाब नजर नहीं आता, और जब उस पहाड़ की चोटी से दुनिया को देखता हूँ तो बहत कुछ बदला हुआ नजर आता है. ऐसे में एक ही स्थान के बारे में मेरे दो दृष्टिकोण उभरकर सामने आते हैं. जब मैं अपनी ही दुनिया में रहकर...