ब्लॉगसेतु

kumarendra singh sengar
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समय के साथ किस तरह स्थितियाँ बदल जाती हैं या कहें कि बदल दी जाती हैं, इसका एहसास किसी को नहीं होता. एक समय था जबकि हमारा बचपन था तब मैदान बच्चों से भरे रहते थे. शाम को घर बैठे रहना डांट का कारण बनता था. हरहाल में शाम को थोड़ी देर मैदान में जाकर कुछ न कुछ खेलना अनिवा...
sanjiv verma salil
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दोहा गीत:दीपक लेकर हाथ *भक्त उतारें आरती, दीपक लेकर हाथ। हैं प्रसन्न माँ भारती, जनगण-मन के साथ।।*अमरनाथ सह भवानी,कार्तिक-गणपति झूम। चले दिवाली मनाने,भायी भारत-भूम।। बसे नर्मदा तीर पर,गौरी-गौरीनाथ। भक्त उतारें आरती, दीपक लेकर हाथ।।*सरस्वती सिंह पर हुईं, दुर्गा सदृश...
दीपक कुमार  भानरे
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दीपों की जगमग से है रोशन सारा जहाँ ,सबके त्याग और सहयोग की है सुन्दर दास्ताँ ।बिन बाती के तेल भी रौशनी दे कहाँ ,बिन तेल के बाती में लौ जले कहाँ ,तेल अपनी आप को समर्पित करता यहाँ ,स्वयं को जला बाती भी रोशन करें जहाँ।दीपक के बलिदान का भी है अपना हिस्सा ,लिये तेल और ब...
 पोस्ट लेवल : रोशन जगमग दीपों roshan jagmag deep
sanjiv verma salil
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http://divyanarmada.blogspot.in/
Yashoda Agrawal
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बीते युगपल-पल, गिन-गिन,शिथिल हुई हर श्‍वासधड़क उठा बैरी उर फिरसुनकर किसकी पदचाप?बह गयारिम-झिम, रिम-झिम,गहन घन-संतापसजल हुआ बैरी उर फिरसुनकर क्‍यूँ मेघ मल्‍लार?बुझ गएझिल-मिल, झिल-मिल,कामनाओं के दीपधधक उठा बैरी उर फिरसुनकर क्‍यूँ मिलन गीत?-दीपा जोशी
Yashoda Agrawal
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घिर के आयीं घटायें सावन बरसे हैं,नैना तेरे दीद को फिर से तरसे हैं !घिर के आयीं घटायें सावन बरसे हैं......मन को कैसी लगन ये लगी हैकैसे प्यास जिया में जागी है,कैसे हो गया मन अनुरागी है, कैसे हो के बेचैन अब रहते हैं !घिर के आयीं घटायें सावन बरसे हैं........अजब ग़ज़...
Ashok Kumar
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तस्वीर द हिन्दू से साभार ● ओम थानवीकुलदीप नैयर का जाना पत्रकारिता में सन्नाटे की ख़बर है। छापे की दुनिया में वे सदा मुखर आवाज़ रहे। इमरजेंसी में उन्हें इंदिरा गांधी ने बिना मुक़दमे के ही धर लिया था। श्रीमती गांधी के कार्यालय में अधिकारी रहे बिशन टंडन ने अपनी ड...
Saransh Sagar
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 जहाँ पूरा देश स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जश्न मना रहा था वही कुछ रेल यात्री जों कि ट्रेन संख्या 12897 ( सियालदह से अजमेर जाने वाली गाड़ी ) में सफर कर रहे थे इसे न मना पाने का अफ़सोस व सोशल मीडिया से सबको संदेश देकर अपनी राष्ट्रभक्ति व जश्न मना रहे थे ! इसी...
sahitya shilpi
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Yashoda Agrawal
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पुरवा की जब - जब चुनरी लहराएपेड़ों, लताओं, कलियों और फूलों कोचूमे सहलाए लाड़ लड़ाए !पुरवा की जब - जब चुनरी लहराएपीढ़े पे बैठी फुलकारी गढ़तीनानी के माथे पे झलकेपसीने को पोंछे सुखाए,हवा झलती जाए !पुरवा की जब - जब चुनरी लहराएकपड़े फैलाती भाभी के घूँघट कोफर - फर उड़ाए,...