ब्लॉगसेतु

अनीता सैनी
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 कुछ हर्षाते लम्हे अनायास ही मौन में मैंने धँसाये  थे  आँखों  के पानी से भिगो कठोर किया उन्हें  साँसों की पतली परत में छिपा ख़ामोश किया था जिन्हें फिर भी  हार न मानी उन्हो...
Kavita Rawat
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प्लीजेंट वैली राजपुर, देहरादून से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'हलन्त' के अंक नवम्बर, 2019 में प्रकाशित मेरी रचना 'वीरानियाँ नहीं होती"जिंदगी में हमारी अगर दुशवारियाँ नहीं होतीहमारे हौसलों पर लोगों को हैरानियाँ नहीं होतीचाहता तो वह मुझे दिल में भी रख सकता थामुनासिब हरेक...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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वर्षों से दीवार पर टंगी तस्वीर से धूल साफ़ की आँखों में करुणा की कसक हया की नज़ाकत मुस्कान के पीछे छिपा  दर्द ये आज भी फीके कहाँ  चीज़ों की उम्र होती है प्रेम की कहाँ लेकिन आँखों ने इशारों में कहा ह...
Kailash Sharma
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    (1)चहरे पर जीवन केउलझी पगडंडियांउलझा कर रख देतींजीवन के हर पल को,जीवन की संध्या मेंझुर्रियों की गहराई मेंढूँढता हूँ वह पलजो छोड़ गये निशानीबन कर पगडंडी चहरे पर।    (2) होता नहीं विस्मृतछोड़ा था हाथज़िंदगी केजिस मोड़ पर।ठहरा है यादों का...
sanjiv verma salil
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Ukoxhr&njd u ik,WaSa nhokjsa ge esa gj ,d rhlekj[kkWadksbZ ugha fdlh ls de A ge vkil esa my>&my>djfn[kk jgs gSa viuh ne A ns[k fNidyh Mj tkrs ij dgrs Mjk u ldrk ;e AvkWa[k ds va/ks ns[k&u ns[ksa njd jgh gSa nhokjsa A+QwVh vkWa[kksa ugha lqgkrhgesa...
Shachinder Arya
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अभी जब से सो कर उठा हूँ, तब से पता नहीं किन अजीब-अजीब से ख़यालों से भर गया हूँ। कैसे इन विकृत से बेढंगे सवालों ने मुझे घेर लिया। ऐसा क्यों होता है, हम न चाहते हुए भी लिखने को मज़बूर हो जाते हैं। कहाँ खाली बैठा रहता। कुछ सोचता। कुछ बैठा रहता। सोचता भी शायद यही सब। या...
Shachinder Arya
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उसमें बहुत सारी चीज़ें या तो अपने आप गुम हो गई हैं या गुम कर दी गयी हैं। चीजों का न दिखना अकसर हमें ऐसा ही करता जाता है। लगता है, ऐसा बहुत कुछ था जो दिख नहीं रहा, उसे कौन कहेगा। मैंने ऐसा जान बूझकर नहीं किया। कभी हो जाता हो, तो पता नहीं। इसने कहीं से भी शहर को ढक नह...
Shachinder Arya
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ड्राफ़्ट में देखा तो तारीख़ आठ मार्च दो हज़ार तेरह की है। उसके साल भर पहले, आठ मार्च के दिनशहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्या  लिखी थी, तभी समझ गया था, स्त्री-पुरुष दोनों एकसाथ चलते हुए किसी भी निर्मिति को बनाते हैं। भले हम उसके अलग-अलग पाठ बनाते जाएँ, पर वह...
Shachinder Arya
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पुरानी दिल्ली, दरियागंज। किताबों की ज़िंदगी भी कैसी होती है। कभी ऐसा भी होता है, हम अचानक उस किताब तक पहुँच जाते हैं, जो इसी शहर में न जाने किसकी अलमारी में, मेज़ पर, कहीं अलगनी पर टंगे झोले में कब से पड़ी रही होंगी। फ़िर एक दिन आया होगा, जब उनकी कीमत मूल्य विहीन होकर...
Shachinder Arya
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वर्माजी देखने में साधारण से मास्टरजी लगते हैं। जैसे विनोद कुमार शुक्ल की कविता से अभी-अभी बाहर निकले हों। जो उनके घर कभी नहीं आएँगे, वह उनसे मिलने उनके पास चले जायेंगे। पास पहुँचकर वह सिर्फ़ हालचाल लेंगे। और कुछ नहीं कहेंगे। ऐसे ही वे हमारे बचपन में मास्टर बनकर आए।...