ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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वर्माजी देखने में साधारण से मास्टरजी लगते हैं। जैसे विनोद कुमार शुक्ल की कविता से अभी-अभी बाहर निकले हों। जो उनके घर कभी नहीं आएँगे, वह उनसे मिलने उनके पास चले जायेंगे। पास पहुँचकर वह सिर्फ़ हालचाल लेंगे। और कुछ नहीं कहेंगे। ऐसे ही वे हमारे बचपन में मास्टर बनकर आए।...
Shachinder Arya
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देखते-देखते पाँच साल बीत गए। जैसे अभी कल ही की तो बात है। लेकिन जैसे अगले ही पल लगता है, यह पिछली पंक्ति और उससे पिछली पंक्ति कितनी झूठ है। सरासर झूठ। पाँच साल। कितना बड़ा वक़्त होता है। हमारी ज़िंदगी के वह साल, जब हम जोश से भरे हुए किसी भी सपने को देख लेने की ज़िद से...
Shachinder Arya
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क्या लिख दूँ ऐसा कि कभी फ़िर लिखने की ज़रूरत ही न पड़े। बड़े मन से कमरे में दाख़िल हुआ था के आहिस्ते-आहिस्ते मन की परतों को उधेड़ता, कुछ नीचे दब गयी यादों को कह जाऊंगा। कहना क्या इतना आसान होता है हरबार। जो मन में आया, कह दिया? पता नहीं। शायद कभी.. कुछ नहीं। इसबार दो मही...
Shachinder Arya
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आज शायद इस कमरे में आखिरी रात होगी। इसतरह अभी सुबह इस कमरे में लिखी जा रही यह आख़िरी पोस्ट। छूटना सिर्फ़ बिन हड्डी वाले नरम दो हाथों का नहीं होता। कमरे भी छूटा करते हैं। यह स्थापत्य कला का कोई बेजोड़ नमूना नहीं है, हमारी न जाने कितनी ‘यादों का घर’ है। इसे एक दिन ऐसे ह...
Shachinder Arya
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एक छोटीसी झोपड़ी थी। उन सबने मिलकर उसका नाम झोपड़ी ही रखा था। शहर और सड़क कही जाने वाली संरचनाओं से बहुत दूर। हमारी परछाईं से भी बहुत दूर। कहीं दिखाई न देने वाली जगह के पास। वहाँ तक जाने वाले रास्ते को वह कितना भी याद करतीं, वह कभी याद नहीं रहता। यह भूल जाने के बाद या...
Shachinder Arya
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तारीख़ अट्ठारह सितंबर। साल दो हज़ार चौदह। एक साल और बीत गया। इसे ‘जुड़ गया’, कहने का मन था। फ़िर भी क्यों नहीं कह पाया, पता नहीं। इस दुनिया में हमारी भी गलियाँ, कई खिड़कियों से गुजरते दृश्यों को ‘स्थिर’ कर सामने रख देती होंगी। किसी विचार के भीतर घूमते, किसी याद को याद क...
Shachinder Arya
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अगस्त बाईस तारीख। दिल्ली में बारिश, बारिश कहने लायक भी नहीं हुई है। उमस कम है पर आसमान से बूँदें भी नहीं गिर रहीं। सब इंतज़ार में हैं। पेड़, बिरवे, मोर, चिरिया, पंछी, मिट्टी, घास, भूत परेत सब। महिना ख़त्म होने को है और करने के लिए कुछ नहीं है। ऐसा मन सोचता है, पर कई स...
Shachinder Arya
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हर शहर में कुछ-कुछ हम होते हैं। हमारी साँसें हमेशा बहाने बनाकर उधर ही खिंचती रहती हैं। हवाओं में उड़ती पतंगों की डोर की तरह, आसमान में अपनी मर्ज़ी से नाचती रहती हैं। ढील देते उँगलियों के बीच फँसे मँजे की तरह। धड़कनें हर धड़कन के साथ वहीं ले जाती हैं। हम कहीं खोई-खोई सी...
Shachinder Arya
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असल में हम सब सपनों में जीने वाले लोग हैं। हमारी ज़िन्दगी ऐसा नहीं है, ख़ूबसूरत नहीं है। ये भी नहीं के उसमे रंग कुछ कम हैं। चटकीले फिरोज़ी से लेकर दुधिया नीले तक। कोमलतम स्पर्शों की छुअन दिल में मौके बे-मौके धड़कन की तरह झिलमिलाती रहती हैं। आवाज़ें भी जेब भर-भर हैं। दूर...
Shachinder Arya
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इस शीर्षक को सवाल की तरह ही देख रहा हूँ। इसमें कोई जवाब नहीं छिपा है। फ़िर भी, इसे घूरे जा रहा हूँ। मार्च का पाँचवा दिन सुबह के यही कोई साढ़े नौ बज रहे हैं। कितने दिन हो गए यहाँ आए? अभी गिने नहीं हैं। उन्हे गिनने के लिए उँगलियाँ कम नहीं पड़ेंगी। पर क्या करूँ, नहीं देख...