ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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मेल से आई चिट्ठी जादा सबर और वक़्त मांगती है, लोग कहीं अरझे नहीं रहना चाहते होंगे। शायद इसलिए हमारी दुनिया इससे इससे बचती रही होगी। पर मुझे आश्चर्य है कि आप कैसे वहाँ तक पहुँच गईं कि मैं इतना लिखते हुए भी चुप्पा किस्म का हूँ? बहुत मानीखेज लगा मुझे। पता नहीं यह क्या...
Shachinder Arya
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आज शायद इस कमरे में आखिरी रात होगी। इसतरह अभी सुबह इस कमरे में लिखी जा रही यह आख़िरी पोस्ट। छूटना सिर्फ़ बिन हड्डी वाले नरम दो हाथों का नहीं होता। कमरे भी छूटा करते हैं। यह स्थापत्य कला का कोई बेजोड़ नमूना नहीं है, हमारी न जाने कितनी ‘यादों का घर’ है। इसे एक दिन ऐसे ह...
Shachinder Arya
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एक छोटीसी झोपड़ी थी। उन सबने मिलकर उसका नाम झोपड़ी ही रखा था। शहर और सड़क कही जाने वाली संरचनाओं से बहुत दूर। हमारी परछाईं से भी बहुत दूर। कहीं दिखाई न देने वाली जगह के पास। वहाँ तक जाने वाले रास्ते को वह कितना भी याद करतीं, वह कभी याद नहीं रहता। यह भूल जाने के बाद या...
Shachinder Arya
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दिल्ली हमारे सपनों का शहर। हम कभी सपनों में भी दिल्ली नहीं आपाते। अगर हमारी दादी ने हमारे पापा को बाहर पढ़ने के लिए भेजा न होता। तब यहाँ रहना तो दूर, इसे कभी छू भी नहीं पाते। हम दिल्ली रोज़ सुनते, पर कभी इसे देख नहीं पाते। हम भी वहीं चार-पाँच साल पहले तुमसे शादी और द...
Kailash Sharma
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घर नहीं होता बेज़ानदारछत से घिरी चार दीवारों का,घर के एक एक कोने में छुपा इतिहास जीवन का।खरोंचें संघर्ष कीजीवन के हर मोड़ की,सीलन दीवारों पर बहे हुए अश्क़ों की,यादें उन अपनों की जो रह गये बन केएक तस्वीर दीवार की,गूंजती खिलखिलाहट अब भी इस सूने घर मे...
Kailash Sharma
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कल खरोंची उँगलियों सेदीवारों पर जमी यादों की परतें,हो गयीं घायल उंगलियाँरिसने लगा खूनडूब गयीं यादें कुछ पल कोउँगलियों के दर्द के अहसास में।कितनी गहरी हैं परतें यादों की,आज फ़िर उभर आया अक्स दीवारों पर यादों का,नहीं कोई कब्रगाहजहाँ दफ़्न कर सकें यादें,शायद चाहतीं साथ...
Shachinder Arya
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वह अचानक एक पोस्ट में ख़ुद को पाकर  हैरान रह गया। उसकी हैरानी को डर में बदलते देखने का एहसास किसी भी तरह से रोमांचित नहीं कर रहा था। वहाँ उसका नाम नहीं था, बस कुछ इशारे थे। बहुत बारीक-सी सीवन उधेड़ते सब उसे देख लेते। यह कैसा होता होगा, जब कोई हमारे बारे में लिखन...
Kailash Sharma
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कर बंद पिटारा सपनों का,बहते अश्क़ों को रोक लिया.अंतस को जितने घाव मिले स्मित से उनको ढांक लिया.विस्मृत कर अब सब रिश्तों को,अब मैंने फ़िर जीना सीख लिया.करतल पर खिंची लकीरों कोहै ख़ुद मैंने आज खुरच डाला.अब किस्मत की चाबी मुट्ठी में, खोलूँगा सभी बेड़ियों का ताला.नहीं चाह...
Shachinder Arya
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तारीख़ अट्ठारह सितंबर। साल दो हज़ार चौदह। एक साल और बीत गया। इसे ‘जुड़ गया’, कहने का मन था। फ़िर भी क्यों नहीं कह पाया, पता नहीं। इस दुनिया में हमारी भी गलियाँ, कई खिड़कियों से गुजरते दृश्यों को ‘स्थिर’ कर सामने रख देती होंगी। किसी विचार के भीतर घूमते, किसी याद को याद क...
Shachinder Arya
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अगस्त बाईस तारीख। दिल्ली में बारिश, बारिश कहने लायक भी नहीं हुई है। उमस कम है पर आसमान से बूँदें भी नहीं गिर रहीं। सब इंतज़ार में हैं। पेड़, बिरवे, मोर, चिरिया, पंछी, मिट्टी, घास, भूत परेत सब। महिना ख़त्म होने को है और करने के लिए कुछ नहीं है। ऐसा मन सोचता है, पर कई स...