ब्लॉगसेतु

रवीन्द्र  सिंह  यादव
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दोपहर   बनकर   अक्सर  न   आया   करो।सुबह-शाम   भी   कभी   बन   जाया   करो।।चिलचिलाती   धूप    में   तपना   है  ज़रूरी।कभी  शीतल  चाँदनी  में  भी  नहाया  करो...
Bhavana Lalwani
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दिन गुज़रते हैं फिर भी वक़्त थमा  हुआ सा है.ये एक अजीब मौसम है, इसमें दिन और रात का हिसाब आपस में गड्डमड्ड सा हो गया है. यहां उत्तरी ध्रुव की लम्बी रौशनियों वाली रातें भी हैं और  महासागर  के अथाह विस्तार जैसे  अनंत तक पसरे हुए दिन भ...
मधुलिका पटेल
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सोच रहा हूँ आज अपने गाँव लौट लेगांवों में अब भी कागा मुंडेर पर नज़र आते हैंउनके कांव - कांव से पहुने घर आते हैं पाँए लागू के शब्दों से होता है अभिनंदनआते ही मिल जाता है कुएँ का ठंडा पानी और गुड़ धानीनहीं कोइ सवाल क्यों आए कब जाना है नदी किनारे गले मे...
Shachinder Arya
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धूप-छाव सामने खिड़की से लगे शीशे के पार लगातार आँख-मिचौली खेलते दिखते रहे। उनका दिखना आँखों से नहीं रौशनी से है, जो बादलों को चीरकर अंदर तक दाखिल होती जाती। दुनिया उन लकड़ी के कब्जों  से बहुत दूर भी रही होगी, जो इस वक़्त दीवार से कहीं भागे जाने को नहीं दिख रहे। व...
Shachinder Arya
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इसे ढाबली कहते हैं, पर अभी बंद है। एक अरुण की भी है, पान की। वह बंद है, वह खुली है। जो ट्रॉली के बिलकुल पीछे खुली है,  वही बिसातखाना है। इसकी कहानी फ़िर कभी।
Shachinder Arya
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किसी खाली सुनसान स्टेशन के ‘प्लेटफ़ॉर्म’ की तरहउस अकेलेपन में इंतज़ार कर देखना चाहता हूँकैसा हो जाता होगा वह जब कोई नहीं होता होगाकोई एक आवाज़ भी नहींकहीं कोई दिख नहीं पड़ता होगाबस होती होगी अंदर तक उतरती खामोशीदूर तक घुप्प अँधेरे सा इंतज़ार करता ऊँघता ऊबताकि इस अँधेरे...