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ऋता शेखर 'मधु'
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गुलमोहर खिलता गया, जितना पाया ताप |रे मन! नहीं निराश हो, पाकर के संताप |।१उसने रौंदा था कभी, जिसको चींटी जान।वही सामने है खड़ी, लेकर अपना मान।।२रटते रटते कृष्ण को, राधा हुई उदास।चातक के मन में रही, चन्द्र मिलन की आस।।३रघुनन्दन के जन्म पर, सब पूजें हनुमान।आखिर ऐसा क्...
sanjiv verma salil
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पद छंद: दोहा.*मन मंदिर में बैठे श्याम।।नटखट-चंचल सुकोमल, भावन छवि अभिराम।देख लाज से गड़ रहे, नभ सज्जित घनश्याम।।मेघ मृदंग बजा रहे, पवन जप रहा नाम।मंजु राधिका मुग्ध मन, छेड़ रहीं अविराम।।छीन बंसरी अधर धर, कहें न करती काम।कहें श्याम दो फूँक तब, जब मन हो निष्काम।।चाह न...
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ऋता शेखर 'मधु'
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प्रेम लिखो पाषाण पर, मन को कर लो नीर।बह जाएगी पीर सब, देकर दिल को धीर।।1मन दर्पण जब स्वच्छ हो, दिखते सुन्दर चित्र।धब्बे कलुषित सोच के, धूमिल करें चरित्र।।2मन के तरकश में भरे, बोली के लख बाण।छूटें तो लौटें नहीं, ज्यों शरीर के प्राण।।3अवसादों की आँधियाँ, दरकाती हैं भ...
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ऋता शेखर 'मधु'
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जब छाए मन व्योम पर, पीर घटा घनघोर|समझो लेखन बढ़ चला, इंद्रधनुष की ओर||दिशा हवा की मोड़ते, हिम से भरे पहाड़।हिम्मत की तलवार से, कटते बाधा बाड़।।खुशी शोक की रागिनी, खूब दिखाते प्रीत। जीवन के सुर ताल पर, गाये जा तू गीत।।शब्द शब्द के मोल हैं, शब्द शब्द के बोल।मधुरिम बात व...
ऋता शेखर 'मधु'
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दोहे1बहन रेशमी डोर को, खुद देना आकार |चीनी राखी त्याग कर, पूर्ण करो त्योहार||2महकी जूही की कली, देखन को शुभ भोरखग मनुष्य पादप सभी, किलक रहे चहुँ ओर3मन के भीतर आग है, ऊपर दिखता बर्फ़।अपने अपनों के लिए, तरल हुए हैं हर्फ़।।4ज्ञान, दान, मुस्कान धन, दिल को रखे करीब।भौतिक...
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ऋता शेखर 'मधु'
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1.फूल शूल से है भरा दुनिया का यह पन्थचक्षु सीप में रच रहा बूँदों का इक ग्रन्थ2.ज्ञान डोर को थाम कर तैरे सागर बीचतंतु पर है कमल टिका छोड़ घनेरी कीच3.पहन सुनहरा घाघरा, आई स्वर्णिम भोरदेशवासियो अब उठो, सरहद पर है चोर4.तपी धरा वैशाख की आया सावन यादमन की पीर कौन गहे गुलम...
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ऋता शेखर 'मधु'
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अपने गम को खुद सहो, खुशियाँ देना बाँटअर्पित करते फूल जब, कंटक देते छाँटये मिजाज़ है वक़्त का, गहरे इसके काजराजा रंक फ़कीर सब, किस विधि जाने राजदुख सुख की हर भावना, खो दे जब आकारवो मनुष्य ही संत है, रहे जो निर्विकारदरिया हो जब दर्द का, रह रह भरते नैनहल्की सी इक ठेस भी,...
ऋता शेखर 'मधु'
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दो पहलू हर बात के, सहमति और विरोधकह दो मन के भाव को,नहीं कहीं अवरोधमूक बनोगे आज जब, हो जाएगी चूकहोंगे कल के बोल तब, वीराने की कूकचुप रहने से जिंदगी, बदले अपनी चालक्यों पूछे उस वक्त में, कोई तुम्हारा हालनित नित लिखते मित्र जो, बनते थे चर्वाकचुप रहकर के वो बने, बड़े...
ऋता शेखर 'मधु'
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वीरों को नमन...हँसते हँसते देश पर, जो होते कुर्बानभारत को आज भी, उनपर है अभिमानशोकाकुल सरिता थमी, थमे पवन के पाँवगम में डूबा है नगर, ठिठक रही है छाँवलोहित होता है गगन, सिसक रहे हैं प्राणइधर बजी है शोक धुन, उधर मचलते बाणहोती है खामोश जब, चूड़ी की झनकारविधवा सूनी माथ...
ऋता शेखर 'मधु'
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आनत लतिका गुच्छ से, छनकर आती घूपज्यों पातें हैं डोलतीं, छाँह बदलती रूप 40खग मानस अरु पौध को, खुशियाँ बाँटे नित्यकर ले मेघ लाख जतन, चमकेगा आदित्यदुग्ध दन्त की ओट से, आई है मुस्कानप्राची ने झट रच दिया, लाली भरा विहानलेकर गठरी आग की, वह चलता दिन रातबदले में नभ दे रहा,...