ब्लॉगसेतु

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मखमली लिबास आज तार-तार हो गया! मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  सभ्यताएँ मर गईं हैं, आदमी के देश में, क्रूरताएँ बढ़ गईं हैं, आदमी के वेश में, मौत की फसल उगी हैं, जीना भार हो गया! मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  भोले पंछियो...
अनंत विजय
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केंद्र में भले ही नई सरकार बनने जा रही है, लेकिन सोलहवें लोकसभा के लिए तकरीबन दो महीने तक चले प्रचार के दौरान लोकतंत्र के मर्यादा की चूलें हिल गई । एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप और सियासी हमले ने सारी सीमाएं तो़ड़ दीं । नेताओं के बयानों ने समाज और कानून की परंपराओं क...
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छलक जाते हैं अब आँसू, ग़ज़ल को गुनगुनाने में।नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।नदी-तालाब खुद प्यासे, चमन में घुट रही साँसें,प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।हुए बेडौल तन, चादर सिमट कर हो गई छोटी,शजर मशगूल हैं अपने फलों को आज ख...
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आज मेरे देश को क्या हो गया है?मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??पुष्प-कलिकाओं पे भँवरे, रात-दिन मँडरा रहे,बागवाँ बनकर लुटेरे, वाटिका को खा रहे,सत्य के उपदेश को क्या हो गया है?मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??धर्म-मज़हब का हमारे देश में सम्मान है,जि...
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मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत"गीत गाना जानते हैं" वेदना की मेढ़ को पहचानते हैं।हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।भावनाओं पर कड़ा पहरा रहा,दुःख से नाता बहुत गहरा रहा,,मीत इनको हम स्वयं का मानते हैं।हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।रात-दिन चक्र चलता जा र...
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मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत"मोटा-झोटा कात रहा हूँ" रुई पुरानी मुझे मिली है, मोटा-झोटा कात रहा हूँ।मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।खोटे सिक्के जमा किये थे, मीत अजनबी बना लिए थे,सम्बन्धों की खाई को मैं, ख...
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मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत"सिमट रही खेती" सब्जी, चावल और गेँहू की, सिमट रही खेती सारी।शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।।बाग आम के-पेड़ नीम के आँगन से  कटते जाते हैं, जीवन देने वाले वन भी, दिन-प्रतिदिन घटते जाते है, लगी...
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मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत"विध्वंसों के बाद नया निर्माण"पतझड़ के पश्चात वृक्ष नव पल्लव को पा जाता।विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।भीषण सर्दी, गर्मी का सन्देशा लेकर आती, गर्मी आकर वर्षाऋतु को आमन्त्रण भिजवाती,सजा-धजा ऋतुराज प्रेम के अ...
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मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत"श्वाँसों की सरगम"कल-कल, छल-छल करती गंगा,मस्त चाल से बहती है।श्वाँसों की सरगम की धारा,यही कहानी कहती है।।हो जाता निष्प्राण कलेवर,जब धड़कन थम जाती हैं।सड़ जाता जलधाम सरोवर,जब लहरें थक जाती हैं।चरैवेति के बीज मन्त्र को,पुस्तक-प...
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मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत"अनजाने परदेशी"वो अनजाने से परदेशी!मेरे मन को भाते हैं।भाँति-भाँति के कल्पित चेहरे,सपनों में घिर आते हैं।। पतझड़ लगता है वसन्त,वीराना भी लगता मधुबन,जब वो घूँघट में से अपनी,मोहक छवि दिखलाते हैं।भाँति-भाँति के कल्पित चेहरे...