ब्लॉगसेतु

रणधीर सुमन
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    प्रिय भुवनेश, मैं राष्ट्र के प्रति तुम्हारी भावना की कद्र करता हूं लेकिन फिर भी कहूंगा कि यह एक कृत्रिम अवधारणा है। जिस तरह से किसी की धर्म या ईश्वर में आस्था होती है उसी तरह तुम्हारी आस्था राष्ट्र में है। किंतु तुम्हारी राष्ट्र के प्रति यह आस्था...
प्रतिभा सक्सेना
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  *कल  रात बहुत देर तक बैठक जमी  .जिन्हें अच्छा ऑफ़र मिला ,उनमें मैं भी एक था ,लोग  घेरे बैठे रहे .  अभी और कंपनियाँ आनेवाली थीं देर-सवेर  मिलने की आशा सबको थी.'सुबह निकलना है' - कह कर मुश्किल से जान छुड़ाई .सोचता जा रहा था - बिना...
विजय राजबली माथुर
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प्रस्तुत लेख में वास्तविक स्थितियों का उल्लेख न कर सतही सोच के आधार पर वामपंथ को ढलता सूरज कह दिया गया है। सूरज सांयकाल ढलता है तो प्रातः काल उगता भी तो है। वैसे सच यह है कि न सूरज उगता है और न ढलता ही है। यह तो मात्र हमारी अपनी दृश्यता व अदृश्यता है। सूरज ब्रह्मां...
केवल राम
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दुनिया जिस रफ़्तार से बदल रही है वह हमारे लिए एक अद्भुत सत्य है. भौतिक संसाधनों का जिस तरीके से फैलाव आज हम दुनिया में देख रहे हैं वह मनुष्य की प्रगति का सूचक है. इस पड़ाव पर पहुँचने के लिए मनुष्य ने अपने जीवन के सभी साधनों को समर्पित किया है. मनुष्य के आज तक के इतिह...