ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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बचपन की यादों में सबसे अनछुई याद है नानी के घर की। हमलोग इसी मौसम में झुलसती गरमियाँ अपने गाँव में बिताने हरसाल लौट आते। वहाँ हमें छोड़कर सब रहा करते। वहाँ बस, हम ही नहीं हुआ करते। पता नहीं हम कितने छोटे रहे होंगे जब पापा हीरो मजेस्टिक खरीदकर लाये। शायद मेरे मुंडन क...
Shachinder Arya
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इधर मौसम ठंडा हुआ है। खिड़की से आती हवा अपने साथ उसकी गंध भी लेते आई है। वह दिखने में किसी भी रंग की हो पर महसूस हो रही है। शामें सुबह की तरह सर्द हैं। पीछे रिज से होते हुए वह सबसे पहले हम तक पहुँच जाती है। सूरज भी थोड़ा सुस्त सा नज़र आता है। शाम उस कुर्सी पर बैठते अब...
Shachinder Arya
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धीरे-धीरे अँधेरा बढ़ रहा है। ठंड भी नीचे उतर आई है। सूरज ढले कई पहर बीत गए हो जैसे। या ऐसी कोई चीज़ उस जगह ने कभी देखी ही नहीं है। पता नहीं यह क्या था। बस अँधेरे की तरह दिख रहा है। हमें जल्द ही वहाँ से चल पड़ना होगा। ताकि आगे कोई होटल मिल सके। पर दिक्कत है अभी तक पीछे...
Shachinder Arya
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नींद आ रही है पर लेटुंगा नहीं। क्योंकि पता है लेटने पर भी वह आने वाली नहीं है। इधर वह ऐसे ही परेशान करने लगी है। करवट-करवट बस उबासी आती है नींद नहीं। और फ़िर जब यादें खुली आँखों से आस पास तैर रही हों तो सोने की क्या ज़रूरत। ऐसे ही कल हम मनाली थे। माल रोड घूम रहे थे।...
Shachinder Arya
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जगहें वही रहती हैं उनके किरदार बदल जाते हैं। हमारा कॉलेज उसी जगह था जहाँ बीते तीन महीने से उसे देखते आ रहे थे। कहीं से भी थोड़ा भी अलग नहीं लग रहा था। पर कुछ उस दिन में ही था जो उसे अंदर ही अंदर बदल रहा था। शाम धीरे धीरे वहाँ उतर रही थी। जैसे उस जगह पहले कभी उतरते न...
Shachinder Arya
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कभी-कभी पुराने दिन आकर ठहर जाते हैं। और ठहर जाते हैं हम। उनमे हम हैं। कुछ दृश्य हैं। कुछ आवाज़ें गायब सी हो बाहर खड़ी हैं। हम भी बोल नहीं रहे हैं। बस देखे जा रहे हैं। देखना लगातार बदलता रहता है। उसमे बदलते है दिन। हम सोचते नहीं हैं। पर ख़याल ख़ुद आकर पूछते हैं। के कैसे...