जो भी हो जाए कम है,क्यों तेरी आँखें नम हैं?देते हैं  ज़ख्म  अपनें,मिले गैरां से मरहम है।तू अपनी राह चला चल,पीकर अपमान हलाहल।या मोड़ दिशा हवाओं के,गर तुझमें भी कुछ दम है।न्याय सिसक कर रोए,अन्याय की करनी धोए.यहाँ झूठ, फ़रेब के क़िस्से,नित लहराते परचम हैं।नैतिकत...