ब्लॉगसेतु

ज्योति  देहलीवाल
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फिलहाल कोरोना वायरस की महामारी के कारण लाखों लोग बेघर हो गए हैं। लाखों लोग टेंटो में शरण लिए हुए हैं। लाखों लोग दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पा रहे हैं। लेकिन ध्यान देने की बात यह हैं कि ये लाखों लोग अपने आलस के कारण या कर्महीनता के कारण भुखे पेट नहीं सो रहे हैं। ये उ...
अमितेश कुमार
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कमानी सभागार के लंबे चौड़े मंच पर बीच में एक प्लेटफार्म रखा था जिसमें सीढियां बनी थीं. नीचे सतह से प्लेटफार्म के ऊपरी सतह तक तीन कतारों में माइक्रोफोन लगे हुए थे. पीछे काला पर्दा था जिसमें प्रवेश प्रस्थान के लिए थोड़ी सी जगह छोड़ी गई थी. इस मंचीय व्यवस्था के दोनों...
PRAVEEN GUPTA
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◆ वैश्य समाज की भामाशाही परंपरा★ महाराज अग्रसेन ने अपने नगर अग्रोहा में बसने वाले नए शख्श के लिए एक निष्क और एक ईंट हर परिवार से देने का नियम बनाया था। ताकि अग्रोहा में आने वाले हर शख्श के पास व्यापार के लिए पर्याप्त पूंजी हो और वो अपना घर बना सके।★ जगतसेठ भामाशाह...
ज्योति  देहलीवाल
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क्या आपको भी लगता हैं कि छींक आने से अपशकुन होता हैं? शुभ कार्य के लिए घर से निकलते वक्त यदि किसी को छींक आ जाएं तो दो मिनट रुक जाना चाहिए, नहीं तो कोई न कोई अनहोनी होती हैं? यदि हाँ, तो जानिए कि क्या वास्तव में छींक आने से अपशकुन होता हैं? एक बार मैं एक परिचि...
Sanjay  Grover
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मैं तब के वक़्त को याद करना चाहता हूं जब मेरी मां के मैं और मेरी छोटी बहन बस दो ही बच्चे थे। छोटी बहिन आठ या नौ महीने की और मैं शायद साढ़े तीन या चार साल का था। एक दोपहरबाद मेरी मां रसोई में बैठी जूठे बर्तनों का ढेरा मांज रही थी, मैं उसके पीछे कमरें में बैठा याद नही...
sanjiv verma salil
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हिंदी की नाट्य परंपरा  *                 हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेंदु हरिश्चंद्र से मान्य है। भारतेंदु तथा उनके समकालीन नाटककारों ने जन-जाग्रति हेतु  नाटकों...
PRAVEEN GUPTA
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साभार: मरुधर के स्वर, पत्रिका, जमशेदपुर 
Sanjay  Grover
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Photo By Sanjay Groverग़ज़लआओ सच बोलेंदुनिया को खोलेंझूठा हंसने सेबेहतर है रो लेंपांच बरस ये, वोइक जैसा बोलेंअपना ही चेहराक्यों ना ख़ुद धो लेंराजा की तारीफ़जो पन्ना खोलें !क्या कबीर मंटो-किस मुह से बोलें !सबको उठना है-सब राजा हो लें ?वे जो थे वो थेहम भी हम हो लें बैन...
Sanjay  Grover
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(पिछला हिस्सा)आप चीज़ों को जब दूसरी या नई दृष्टि से देखते हैं तो कई बार पूरे के पूरे अर्थ बदले दिखाई देते हैं। बारात जब लड़कीवालों के द्वार पर पहुंचती थी तभी मुझे एक उदासी या अपराधबोध महसूस होने लगता था। गुलाबी पगड़ियों में पीले चेहरे लिए बारात के स्वागत लिए तैयार लोग...
Sanjay  Grover
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नाचने का मुझे शौक था। लेकिन शर्मीला बहुत था। कमरा बंद करके या ज़्यादा से ज़्यादा घरवालों के सामने नाच लेता था। उस वक़्त नाचने के लिए ज़्यादा मंच थे भी नहीं सो बारात एक अच्छा माध्यम था, समझिए कि बस खुला मंच था। एक किसी शादी का इनवीटेशन कार्ड आ जाए तो समझिए कि आपके ल...