ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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अभी जब से सो कर उठा हूँ, तब से पता नहीं किन अजीब-अजीब से ख़यालों से भर गया हूँ। कैसे इन विकृत से बेढंगे सवालों ने मुझे घेर लिया। ऐसा क्यों होता है, हम न चाहते हुए भी लिखने को मज़बूर हो जाते हैं। कहाँ खाली बैठा रहता। कुछ सोचता। कुछ बैठा रहता। सोचता भी शायद यही सब। या...
Shachinder Arya
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इन दीवारों के बीच रहते-रहते वह इतना बड़ा हो गया कि घर में होता तो कभी बाहर निकलने के एहसास से नहीं भर पाता। वह चुप रहकर इन दीवारों को सुनने की कोशिश करता। तब उसे एक धुन सुनाई देती। धीमे-धीमे। आहिस्ता-आहिस्ता। जिधर से वह आवाज़ आती, वह उस तरफ़ अपनी थाली घुमा लेता। प्या...
Shachinder Arya
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वह एकदम शांत क़िस्म की दीवारों वाला घर था। छिपकली भी आहिस्ते से उनसे चिपकी रहती और कोई जान भी न पाता। जाले दरवाज़े के पीछे छिपकर सालों से वहीं बने हुए थे। पलस्तर धीरे-धीरे अम्मा की अधीर आँखों की तरह उखड़ रहा था। सफ़ेदी को सीलन के साथ पपड़ी बने ज़माना बीत गया, किसी को को...
Shachinder Arya
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कोई भी उस कमरे में कभी भी दाख़िल होता, तो उसे लगता, यह कमरा एक जमाने में किसी दफ़्तर का हिस्सा रहा होगा। टूटी मेज़। धूल खाती फ़ाइलें। कोनों में पड़ी कुर्सियाँ। कटे-फटे जूते। मकड़ी के जाले। खिड़की से आती हवा। इधर-उधर बिखरे पड़े पन्ने। चूहों की लेड़ीयाँ। बजबजाता फ़र्श। फटा हुआ...
Shachinder Arya
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वह रोज़ रात आधा पहर बीत जाने के आस-पास पसीने से तरबतर कपड़ों में ख़ुद को ढोते हुए लौट आते। लौटना कमीज़ को वापस घर लाने की तरह होता। वह कोई चित्रकार नहीं थे। पर उनके इस कैनवस पर रोज़ अलग-अलग तरह की चित्रकारी होती। कभी बनियान में अरझी सूखी घास का तिनका किसी किले की सबसे ऊ...
Shachinder Arya
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क्या लिख दूँ ऐसा कि कभी फ़िर लिखने की ज़रूरत ही न पड़े। बड़े मन से कमरे में दाख़िल हुआ था के आहिस्ते-आहिस्ते मन की परतों को उधेड़ता, कुछ नीचे दब गयी यादों को कह जाऊंगा। कहना क्या इतना आसान होता है हरबार। जो मन में आया, कह दिया? पता नहीं। शायद कभी.. कुछ नहीं। इसबार दो मही...
Shachinder Arya
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पता नहीं क्या लिखने बैठा हूँ। पर बैठ गया हूँ। शायद कुछ और बातें होंगी, जो कभी इस दुमाले से नीचे नहीं उतर पायीं। फ़िर बकवास करने में भी हम खुद को इतना तो मान ही लेते हैं कि किसी को कुछ नहीं समझते। खुद को भी नहीं। वह शादी करने के बाद उस मेहनतकश जानवर के सींग की तरह गा...
Shachinder Arya
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उसने अपने एक कमरे वाले शहर के बाहर कई कमरों वाले शहर की संभावनाओं से कभी इंकार नहीं किया। पर उसे पता था कोई जितना भी कहे बाहर का शहर उसके अंदर कभी दाखिल नहीं हो सका। उसने अपने शहर को नाम दिया, घर। घर ही उसकी एक छोटी-सी दुनिया थी। वह बाहर कहीं भी रहता, वापस इस दुनिय...
Shachinder Arya
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ऐसी रात फ़िर कभी न आए। पूरी रात मम्मी के बाएँ पैर में दर्द इतना असहनीय बना रहा कि एक पल के लिए भी कहीं सुकून नहीं मिला। पैर फैला लेना तो दूर की बात है। रह रहकर उस अँधेरे कमरे में रोने को हो आता। कि मम्मी का पैर सवा नौ बजे के बाद ऐसा होता रहा। ग्यारह बजे बिजली की तरह...
Shachinder Arya
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दिल्ली हमारे सपनों का शहर। हम कभी सपनों में भी दिल्ली नहीं आपाते। अगर हमारी दादी ने हमारे पापा को बाहर पढ़ने के लिए भेजा न होता। तब यहाँ रहना तो दूर, इसे कभी छू भी नहीं पाते। हम दिल्ली रोज़ सुनते, पर कभी इसे देख नहीं पाते। हम भी वहीं चार-पाँच साल पहले तुमसे शादी और द...