ब्लॉगसेतु

सतीश सक्सेना
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खस्ता शेरों को देख उठे, कुछ सोते शेर हमारे भी ! सुनने वालों तक पंहुचेंगे, कुछ देसी बेर हमारे भी !पढ़ने लिखने का काम नहीं बेईमानों की बस्ती में !बाबा-गुंडों में स्पर्धा , घर में हों , कुबेर हमारे भी !चोट्टे बेईमान यहाँ आकर बाबा बन घर को लूट रहे जनता को समझाते हांफे,...
सतीश सक्सेना
103
ये कौम ही मिटी, तो वरदान क्या करेंगे !धूर्तों से मिल रहे ये, अनुदान क्या करेंगे ?चोरों के राज में भी, जीना लिखा के लाये बस्ती के मुकद्दर को ही  जान क्या करेंगे ?आशीष कुबेरों का लेकर, बने हैं हाकिम  लालाओं के बनाये दरबान, क्या करें...
सतीश सक्सेना
103
मुर्दा हुए शरीर को , जीना सिखाइये !रोते हुए ज़मीर को , पीना सिखाइये !थोड़े से दर्द में ही,क्यूँ ऑंखें छलक उठी गुंडों की गली में इन्हें , रहना सिखाइये ! गद्दार कोई हो,मगर हक़दार सज़ा के उस्ताद, मुसलमां को ही चलना सिखाइये  !अनभिज्ञ निरक्षर निरे ...
विजय राजबली माथुर
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स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )  संकलन-विजय माथुर, फौर्मैटिंग-यशवन्त यश
सुशील बाकलीवाल
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                           एक पण्डितजी एक दिन शास्त्राथ की जिद में  अपने बच्चे से उलझ गये । बच्चे ने भी एक प्रश्न दाग दिया कि अच्छा बताओ- "वो कौन सी वस्तु है, जो कभी अपवित्र नहीं होती......?...
सतीश सक्सेना
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घर घर से आवाज कन्हैया जीतेगा !कौओं में परवाज़ ,कन्हैया जीतेगा !बुलेट ट्रेन,स्मार्ट सिटी के झांसों में फंदे काट तमाम,कन्हैया जीतेगा !नहले दहले, अंतिम  ठठ्ठा मार रहेमक्कारों पर गाज़,कन्हैया जीतेगा !भारत मां घायल है ,इन गद्दारों  से , जनमन लेके साथ,क...
सतीश सक्सेना
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वह दिन भूलीं कृशकाय बदन,अतृप्त भूख से , व्याकुल हो,  आयीं थीं , भूखी, प्यासी सी इक दिन इस द्वारे आकुल हो जिस दिन से तेरे पाँव पड़े  दुर्भाग्य युक्त इस आँगन में !अभिशप्त ह्रदय जाने कैसे ,भावना क्रूर इतनी मन में ,पीताम्बर प...
सतीश सक्सेना
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हे प्रभु ! इस देश में इतने निरक्षर, ढोर क्यों ?जाहिलों को मुग्ध करने को निरंतर शोर क्यों !अनपढ़ गंवारू जान वे मजमा लगाने आ गए ये धूर्त मेरे देश में , इतने बड़े शहज़ोर क्यों ?साधु संतों के मुखौटे पहन कर , व्यापार में   रख स्वदेशी नाम,सन्यासी मु...
सतीश सक्सेना
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खांसते दम ,फूलता है जैसे लगती जान जाए अस्थमा झकझोरता है, रात भर हम सो न पाएधुआं पहले खूब था अब  यह धुआं गन्दी हवा में समय से पहले ही मारें,चला दम घोटू पटाखे ,राम के आने पे कितने दीप आँखों में जले,अब लिखते आँखें जल रही हैं ,जा...
सतीश सक्सेना
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खांसते दम ,फूलता है जैसे लगती जान जाए अस्थमा झकझोरता है, रात भर हम सो न पाएधुआं पहले खूब था अब  यह धुआं गन्दी हवा में समय से पहले ही मारें,चला दम घोटू पटाखे ,राम के आने पे कितने दीप आँखों में जले,अब लिखते आँखें जल रही हैं ,जा...