ब्लॉगसेतु

Yashoda Agrawal
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ईसा पूर्व और पश्चात जैसेभावनाओं को बाँटने की सुविधादेती नहीं हैं ज़िन्दगीकिसी पुरातत्त्व अवशेष जैसेअचानक उभर आती हैं स्मृतियाँकुछ पाषाण हो चुकींकुछ अभी भी कंकालवो जो पहली बार दरका था विश्वासअब भी किसी पर नहीं हो पातावो जो पेचीदा तरीकों से घुलनशील हैं यादेंउनका एक रं...
Yashoda Agrawal
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रात भर नींदहल्के पत्ते सी तैरती हैआँखों के पोखरों मेंवक़्त कर्मठ श्रमिकगहरे करता जा रहा हैकाले घेरेभोर भारी हैकिसी अनमनी गर्भिणी सीघसीटती खुद कोजानते हुए एक और दिन होगामृत प्रसवदिन लावारिस लाश सामर कर भी नहीं मरताशोर और भीड़उठा नहीं पातेमेरे अकेलेपन की चट्टानशाम सुन्...
Yashoda Agrawal
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कैसा होता होगाआत्मा का शरणार्थीहो जानागुड़ में, साग मेंहवा मेंढूंढना सरहद पार की खुश्बूऔर घंटों हर-रोज़आँखें बंद कर देखनाअपने बचपन का घरठिठुरते हाथों सेशालें स्वेटरें बेचतेउम्मीद की आखरी डोर कोहिमालय के उस पारपोटाला के गुम्बदों सेबांधे रखनाटिमटिमाती नीली-पीलीबस्तियों...
Yashoda Agrawal
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हल्की बर्फ़ मेंएक हाथ थामे रखता हैघुमावदार पगडंडियों परदिल फिसले तो फिसलेतुम न फिसलो !****************उसके होंठ चुनते हैंमेरे होंठों सेबर्फ़ के ताज़ा फ़ाहेबर्फ़ गर्म और मीठीमैंने पहली बार चखी.-पूजा प्रियंवदा
Yashoda Agrawal
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चमकौर का युद्ध1704 में 21, 22, और 23 दिसम्बर को गुरु गोविंद सिंह और मुगलों की सेना के बीच पंजाब के चमकौर में लड़ा गया था। गुरु गोबिंद सिंह जी 20 दिसम्बर की रात आनंद पुर साहिब छोड़ कर 21 दिसम्बर की शाम को चमकौर पहुंचे थे, और उनके पीछे मुगलों की एक विशाल सेना जिसका न...
Yashoda Agrawal
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कितनी अँधेरी रातों के बाद कितने अकेले सफ़र तमाम परिंदे ने कहीं फ़िर आसरे की उम्मीद कर ली थीघर ने कहा तू लौट जा कोई और अब रहता है यहाँ बाकि है तन्हा सफ़र तेरा !लौटा है सफ़र में अकेला परिंदा फ़कीर रूह न किसी की न कहीं इसका बसेर...
Yashoda Agrawal
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याद चारकोल स्केच है धीरे-धीरे मन की पृष्ठभूमि में घुलने लगती हैतुम्हारा छूना एक स्थायी गोदना रूह के माथे पर धुंधलाने लगा हैआसमान काले और सफ़ेद के बीच नीला होना भुला चुका हैतुम्हारी मोहब्बतदीमक बन ख़ोखलाकर रही है मेरे दिल को-पूजा प्र...
Yashoda Agrawal
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मुझ तक आने से पहले ही खर्च चुके थे तुम अपने सारे उम्र भर के वादेगर्मी की किसी दोपहर किसी नीम अँधेरे कमरे में जो होठों से मेरे माथे पर रखा था वो बिछोह था हमेशा काअमृता को पढ़ती हूँ गला भर आता है तुमसे बेतरतीब बालों वाले किसी छो...
Yashoda Agrawal
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शाम को जब घरों में होती है रौशनी देखना मेरी उन आँखों से जिनका कभी घर न हुआबच्चों की हथेलियाँ थामना मेरे उन हाथों से जिन्होंने दफन किया कई अपनेअलविदा की घड़ी महसूस करना मेरे उस दिल से जो धड़कता रहा तुम्हारे जाने के बाद भीफूल नहीं पसंद मुझ...
Yashoda Agrawal
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उद्यम से स्वादविहीन आखिरी रोटी खाती है उसकी रसोई के विश्लेषण में कहे सब कड़वे शब्द चिपके हैं तालू सेसुन्दर, महंगी साड़ी उसने बचा रखी है किसी विशेष अवसर के लिए जब कि मर चुके हैं उसके देह के सारे त्यौहार तुम्हारे बिस्तर मेंब...