ब्लॉगसेतु

kumarendra singh sengar
24
अनलॉक के दौरान बाजार में भीड़ अब अपने पुराने रूप में आती दिख रही है. उरई में शाम पाँच बजे तक बाजार खोलने की अनुमति है. जैसा कि ऊपर से आदेश हैं, उसके अनुसार रात नौ बजे तक नागरिकों के आवागमन पर प्रतिबन्ध नहीं है. एक आवश्यक काम से शाम को सात बजे के बाद निकलना हुआ. उस स...
YASHVARDHAN SRIVASTAV
679
रात के आसमान में सैकड़ों तारे है समाए फिर इकलौते सूरज दादा के खिलने पर ही...
अनीता सैनी
56
तुम्हें मालूम है ? तपिश सहता हुआ वह गुलमोहर,आज भी ख़ामोश निगाहों से,  अहर्निश तुम्हारी राह ताकता रहता है।  जलती जेठ की दोपहरी में भी, लाल,नारंगी,पीली बरसता सतरंगी धूप, वह मंद-मंद मुस्कुराता रहता है।  झरती सांसें जीवन की उसकी, &nbsp...
अजय  कुमार झा
22
कौन सोच सकता था कि किसी छत को यूँ भी सँवारा जा सकता है पिताजी मूलतः एक कृषक परिवार से थे इसलिए अपनी फ़ौजी नौकरी के दौरान भी आवंटित फ़ौजी क्वार्टर के अहाते में हमेशा कुछ कुछ उगाते लगाते मैंने उन्हें बचपन में ही देखा था।  ग्रीष्म ऋतु के अवकाशों में गाँव जाकर...
जेन्नी  शबनम
47
झरोखा  *******  समय का यह दौर  जीवन की अहमियत, जीवन की ज़रुरत सिखा रहा है  मुश्किल के इस रंगमहल में  आशाओं का एक झरोखा जिसे, पत्थर का महल बनाने में  सदियों पहले बंद किया था हमने  अब खोलने का वक्त...
 पोस्ट लेवल : प्रकृति चिन्तन समाज
जेन्नी  शबनम
47
फूल यूँ खिले (10 हाइकु) *******  1.  फूल यूँ खिले,  गलबहियाँ डाले  बैठे हों बच्चे !  2.  अम्बर रोया,  ज्यों बच्चे से छिना  प्यारा खिलौना !  3.  सूरज न...
 पोस्ट लेवल : हाइकु प्रकृति
अनीता सैनी
56
  नितांत निर्जन निरस सूखे अनमने विचार शून्य परिवेश में पनप जाती है वह भी,  जीवन की तपिश सहते हुए भी,  मुस्कुरा उठती है वह, महक जाते हैं देह पर उसके भी,  आशा के सुन्दर सुमन,  स्नेह...
अनीता सैनी
56
प्रदूषण के प्रचंड प्रकोप से ,  दम तोड़ता देख धरा का धैर्य,   बरगद ने आपातकालिन सभा में,   आह्वान नीम-पीपल का किया।  ससम्मान सत्कार का ग़लीचा बिछा, बुज़ुर्ग बरगद ने दिया आसन प्रभाव का,  विनम्र भाव से रखा...
अनीता सैनी
56
सुख-समृद्धि यश-वैभव दयावंत,  वैभवचारी-सा चतुर्दिश सत-उजियारा,  प्रिय प्रीत में प्रतीक्षामान थीं,   उत्सुक आँखें अनिमेष भोर कीं,  तन्मय-सी ताकती तुषार-बूंदें,  मोहक नवल नव विहान को |  खग-वृंद के कलनाद...
अनीता सैनी
56
चाँद सितारों से पूछती हूँ हाल-ए-दिल,  ज़िंदा जल रहे  हो परवाने की तरह ! मरणोपरांत रोशनी आत्मा की तो नहीं,    क्यों थकान मायूसी की तुम पर नहीं आती |हार-जीत का न इसे खेल समझो,  अबूझ पहेली बन गयी है ज़िंदगी, शमा-सी जल रह...