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अनीता सैनी
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  नितांत निर्जन निरस सूखे अनमने विचार शून्य परिवेश में पनप जाती है वह भी,  जीवन की तपिश सहते हुए भी,  मुस्कुरा उठती है वह, महक जाते हैं देह पर उसके भी,  आशा के सुन्दर सुमन,  स्नेह...
अनीता सैनी
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प्रदूषण के प्रचंड प्रकोप से ,  दम तोड़ता देख धरा का धैर्य,   बरगद ने आपातकालिन सभा में,   आह्वान नीम-पीपल का किया।  ससम्मान सत्कार का ग़लीचा बिछा, बुज़ुर्ग बरगद ने दिया आसन प्रभाव का,  विनम्र भाव से रखा...
अनीता सैनी
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सुख-समृद्धि यश-वैभव दयावंत,  वैभवचारी-सा चतुर्दिश सत-उजियारा,  प्रिय प्रीत में प्रतीक्षामान थीं,   उत्सुक आँखें अनिमेष भोर कीं,  तन्मय-सी ताकती तुषार-बूंदें,  मोहक नवल नव विहान को |  खग-वृंद के कलनाद...
अनीता सैनी
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चाँद सितारों से पूछती हूँ हाल-ए-दिल,  ज़िंदा जल रहे  हो परवाने की तरह ! मरणोपरांत रोशनी आत्मा की तो नहीं,    क्यों थकान मायूसी की तुम पर नहीं आती |हार-जीत का न इसे खेल समझो,  अबूझ पहेली बन गयी है ज़िंदगी, शमा-सी जल रह...