ब्लॉगसेतु

kumarendra singh sengar
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हाल ही में एक मामला संज्ञान में आया जो पुलिस से संदर्भित था. पुलिस का नाम सामने आते ही पसीने छूट जाते हैं लोगों के, हमारे भी छूट जाते हैं. अक्सर हम अपने मित्रों से कहते भी हैं कि हमारा और पुलिस का सम्बन्ध उतना ही है जितना हमारा और चंद्रमा का. हम उसे देख सकते हैं, म...
kumarendra singh sengar
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आजकल लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाये और क्या न किया जाये? यह स्थिति किसी आम आदमी की अकेले नहीं है, यह समस्या हर वर्ग के साथ है। जो सम्पन्न हैं उनके साथ समस्या है कि अपनी सम्पन्नता को और कैसे बढ़ाया जाये। कैसे अपनी सम्पन्नता और वैभव के दम पर चारों ओर...
विजय राजबली माथुर
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Hemant Kumar Jha  18-07-2018जो समाज अपने विश्वविद्यालयों को व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में तब्दील कर देता है वह अपने बौद्धिक पतन की राह तो खोलता ही है, नैतिक पतन की ओर भी बढ़ता है।व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में 'आइडियाज ' जन्म लेते हैं जिनका अंतिम उद्देश्य व्यवसाय को...
kumarendra singh sengar
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आज आपके साथ एक पत्र शेयर कर रहे हैं, जो सन 1974 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य रहे श्री ध्रुव नारायण सिंह वर्मा जी ने हमारे पिताजी श्री महेन्द्र सिंह सेंगर को लिखा था. पत्र दन की तरफ से जनप्रतिनिधियों को उपलब्ध कराई जाने वाली डाक-सामग्री में लिखा गया था क्य...
अनंत विजय
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पिछले दिनों भाषा को लेकर दो बहुत अहम खबर आई जिसपर भारतीय समाज में खासतौर पर हिंदी समाज को चर्चा करने की आवश्यकता है। पहली खबर आई देश के महत्वपूर्ण विश्वविद्यालयों में से एक दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में नामांकन के लिए ह...
Bhavna  Pathak
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लोकतंत्र की सुनो कहानीना कोई राजा ना कोई रानीअब आया है नया जमानाबदला सारा चलन पुरानाराजा प्रजा हुए अब एकएक वोट रखता प्रत्येकअपना प्रतिनिधि जनता चुनतीसुनती सबकी करती मन कीसंसद न्यायपालिका भी अंगहैं सरकार मीडिया के संगमिलकर बनते खम्भे चारलोकतंत्र के ये आधार----------...
जन्मेजय तिवारी
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                   नेता जी का जन्मदिन बड़े ठाट-बाट व शोर-शराबे के साथ मनाया जा रहा था । नेता बड़ा हो और आयोजन छोटा, तो प्रतिष्ठा का पारा रसातल में जाने का भय रहता है । वैसे भी ये गरीबों व गरीबी के नेता हैं, ऐसे...
Madabhushi Rangraj  Iyengar
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प्रासंगिक चुनावी मुद्देप्रत्येक राजनीतिक चुनाव में – चाहे वह किसी भी किस्म का हो, पैसे तो जमकर खर्चे जाते हैं. मैं इसे निवेश कहना नहीं चाहूँगा. खर्चा कोई भी करे. अंततः यह सरकार पर ही तो बोझ है. सरकार को पैसा आता कहाँ से है... आम जनता से ही ना... किसी को इसकी चिंता...
रेखा श्रीवास्तव
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                             देश में जनगणना का कार्य आरभ्य होने जा रहा है, हमारा गृह मंत्रालय इसके लिए प्रारूप तैयार कर चुका...