ब्लॉगसेतु

विजय राजबली माथुर
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लखनऊ,  06-05-2018 :कल दिनांक 05 मई 2018 को यू पी प्रेस क्लब, हजरतगंज, लखनऊ में कवि और लेखक कौशल किशोर की दो पुस्तकों  ' वह औरत नहीं महानद थी ' ( कविता संग्रह ) एवं ' प्रतिरोध की संस्कृति ' ( लेखों का संग्रह ) का विमोचन - लोकार्पण तथा समीक्षा कार्यक्रम वरि...
Shachinder Arya
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मैं कभी कुछ नहीं बोलूँगा, बस चुप रहूँगा। आप जब कुछ कहेंगे, तब मैं कुछ नहीं कहूँगा। आप देखने को कहेंगे, मैं बिलकुल नहीं देखुंगा। आपकी सहजता को असहजता में नहीं बदलने दूँगा। आप सहज रहें इसलिए खुद ही असहज होता रहूँगा। कुछ बोलने से पहले कुछ नहीं बोलूँगा। आपके लिए अपना...
Shachinder Arya
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यह तस्वीर जिस वक़्त की है, तब घड़ी पाँच बजकर बाईस मिनट पर स्थिर है और मदन कश्यप अपनी कविता ‘ढपोरशंख’ सुना रहे हैं। मुझे भी आए हुए काफ़ी देर हो चुकी है। शायद एक डेढ़ घंटे से खड़ा हूँ। खड़े-खड़े कमर में दर्द जैसा था, पर लौटने का मन नहीं था। देवेश से पहले समर मुझे वहीं एक कं...
Shachinder Arya
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बिलकुल अभी, सीढ़ियाँ चढ़ते हुए सोच रहा था, कितना अच्छा होता, मैं इस दुनिया के किसी भी देश का नागरिक न होता। पर इस सोचने के साथ ही एक पल में मैंने न केवल राष्ट्र-राज्य के राजनैतिक इतिहास को ख़ारिज कर दिया अपितु इसकी किसी भी तरह से हताश दिखने वाली टिप्पणी में उन सारी पर...
Shachinder Arya
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मैं मूलतः इंसान हूँ। इसलिए थोड़ा विचलित हूँ। थोड़ा दुखी भी हूँ शायद। मेरे पास कहने के लिए कुछ ख़ास नहीं है। पर कभी-कभी कहना ज़रूरी लगता है। जैसे आज।मुझे नहीं पता, आततायी कैसे होते हैं। उनकी शक्लें शायद हमारी तरह ही होती होंगी। लेकिन वह असहिष्णु होते होंगे। उनके पास शाय...
Shachinder Arya
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बड़े दिनों से यह सारे सवाल अंदर-ही-अंदर उमड़ते रहे हैं। कहीं कोई जवाब दिखाई नहीं देता। उन सबका होना हमारे होने के लिए पता नहीं कितना ज़रूरी है? पर यह समझना मुश्किल है कि इधर नींद न आने का असली कारण क्या है? शायद हमें अपनी पहचान छिपाये रखनी है। कोई हमें देख न ले, हम कौ...
Shachinder Arya
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हमारे एक अध्यापक हुए। असल में इसे इस तरह कहा जाना चाहिए कि हम उनके विद्यार्थी हुए। वे कहा करते हैं, जिस चीज़ का आभाव रहता है, उसे ही बार-बार याद करने की ज़रूरत पड़ती है। सब कह रहे हैं आज ‘अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस ’ है। इन अर्थों में इसका मतलब यह हुआ कि शांति अभी भी इच...
Shachinder Arya
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इसे किस तरह लेना चाहिए, पता नहीं। सब यही कहेंगे, इस पर कुछ नहीं कहना चाहिए। पर कहीं अंदर से लगता है, बात होनी चाहिए। गंभीरता से होनी चाहिए। हम नहीं करना चाहेंगे, फ़िर भी। थोड़ी झिझक के साथ। थोड़े छिपकर। कुछ नाम के साथ करेंगे। कुछ नाम नहीं लेंगे, सिर्फ़ संकेत या सूत्र व...
Shachinder Arya
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यह ‘जम्मू’ से ज़्यादा ‘कश्मीर’ में आई बाढ़ है। ऐसा मैं नहीं कह रहा, ऐसा टीवी चैनल दिखा रहे हैं। कई प्रबुद्धजन बीते सालों में आई बाढ़ों के ब्योरों के साथ तय्यार हैं। कोई उन्हे किसी बहस में बुला ले बस। ऐसे भी लोग हैं, जो इस आपदा काल में सेना की रचनात्मक और सकर्मक भूमिका...
Shachinder Arya
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पाँच सितंबर, हर साल, शासकीय परंपरा में इसे ‘शिक्षक दिवस’  के रूप में मनाने की कवायद राष्ट्रीय स्तर पर देखी जा सकती है। इस साल तो यह अति राष्ट्रव्यापी  है। बहरहाल। यह दिन क्यों निश्चित किया गया, अपने आप में पूछे जाने लायक सवाल है। कई प्रबुद्धजन अपनी भूमिका...