ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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गाँधी जयंती के ठीक एक दिन बाद। साल दो हज़ार बारह। राजकमल, दरियागंज जाकर कई किताबें साथ ले आया। उसी में एक किताब थी डॉ. तुलसी राम की ‘मुर्दहिया’। किताबें इत्मीनान माँगती हैं। थोड़ा रुककर साथ चलने का धैर्य। आहिस्ते से आमने सामने बैठने का खालीपन। मुड़कर वापस लौट आने की ह...
Shachinder Arya
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पिछली पोस्ट पर श्वेता को ‘जेंडर डिस्कोर्स’ की संभावना दिख रही होंगी, लवकेश पीछे पन्नों पर उकड़ू बैठ उन्हे पढ़ रहा होगा। करिहाँव दर्द करने लगे होंगे। राकेश फ़ोन करने की सोच रहा होगा, पर सिर्फ़ सोचता रहेगा। कर नहीं पाएगा। वह भी कुछ सोच रही होगी। पर कुछ कह नहीं पाएगी। इन...
Shachinder Arya
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अब जबकि दिल्ली को कुछ ही देर में ‘मुख्यमंत्री’ मिलने वाला है इन सब बातों का कोई अर्थ नहीं, ऐसा नहीं है। यहाँ नीचे जो कुछ भी आने वाला है, वह कम-से-कम एक ‘नरेटिव’ की तरह काम हो करेगा ही। एक उत्तर पाठ। बात हमारे एमए के दिनों की है। हमारी ‘फ़ैकल्टी’ हमारे ही डिपार्...
Shachinder Arya
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सड़क। उसका किनारा। किसी सागर से कम उथला नहीं। बस दिखाई नहीं देता। बस कभी-कभी महसूस होता है। जैसे इन शामों को। जब ठंड थोड़ी बढ़ रही होती है। सूरज कहीं दिख नहीं रहा होता। अँधेरा उन रौशनियों के गायब हो जाने के इंतज़ार में कहीं किसी कोने में घात लगाये बैठा रहता है। दिल्ली...
Shachinder Arya
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बहराइच कभी-कभी जनसत्ता में नज़र आ जाता है। अधिकतर वहाँ संजीव श्रीवास्तव होते हैं। और ख़बरों में सागौन की लकड़ी की तस्करी से लेकर दुधवा नेशनल पार्क। कभी घाघरा नदी की बाढ़ भी बनी रहती है। कमाल खान भी इकौना जाकर रिपोर्टिंग कर आए हैं। उन्होने ही बताया था कि यहाँ से दो बार...
Shachinder Arya
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उस दोपहर राजेश जोशी की एक कविता का नाम यादकर लौटा। घर पहुँच उसे खूब ढूँढा। नहीं मिली। कविता में एक ‘प्लेटफॉर्म’ की बात थी। बात क्या थी याद नहीं। पर उसे दोबारा पढ़ लेने का मन था। जहाँ-जहाँ मिल सकती थी, देखा। नहीं मिली। दिल थोड़ा बैठ गया। मन मान नहीं रहा था। बड़ी देर तक...
Shachinder Arya
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हमारे घर में मिट्टी का घड़ा इसलिए नहीं है के हम अतीतजीवी हैं और हमने घर में जगह न होने को बहाने की तरह ओढ़ लिया है। यह विशुद्ध हमारे चयन और इच्छा का निजी मामला है। इसमे किसी भी तरह के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेंगे। फ़िर ऐसा भी नहीं है कि हम जहाँ भी जाते हैं घड़े का...
Shachinder Arya
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अपनी बात कहने से पहले थोड़ा पीछे बचपन की तरफ़ जाता हूँ जहाँ मेनका गाँधी का उदय होना अभी बाकी है। वहाँ की कोई याद नहीं है कि कभी लाल किले पर कोई सर्कस लगा हो और वहाँ शेर की दहाड़ सुनाई दी हो। शायद छोटे रहे थे जब आखिरी बार इन जानवरों वाला सर्कस देखा था। भूल गए होंगे। बह...
Shachinder Arya
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पता नहीं तुम कैसे होते गए होगे। तुमने बिन कहे मना किया होगा। थोड़ा झिझके होगे। थोड़े पैर लड़खड़ाए होंगे। बिलकुल जुबान की तरह वह भी कुछ कहते-कहते रुक गए होंगे। कैसे कहूँ। यही सोचते-सोचते तुम बस खड़े रह गए। चेहरा किसी नयी नवेली दुल्हन की तरह शरमाया सा नहीं लग रहा। बस तुम्...