ब्लॉगसेतु

sanjiv verma salil
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कृति चर्चा :"गाँव देखता टुकुर-टुकुर" शहर कर रहा मौज आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'*[कृति विवरण - गाँव देखता टुकुर-टुकुर, नवगीत संग्रह, नवगीतकार - प्रदीप कुमार शुक्ल, प्रथम संस्करण, वर्ष २०१८, आवरण - बहुरंगी, पेपरबैक, आकार - २१ से. x १४ से., पृष्ठ १०७, मूल्य ११०/-, प्रक...
शिवम् मिश्रा
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 ऐ मेरे वतन के लोगों एक हिन्दी देशभक्ति गीत है जिसे कवि प्रदीप ने लिखा था और जिसे संगीत सी॰ रामचंद्र ने दिया था। ये गीत चीन युद्ध के दौरान मारे गए भारतीय सैनिकों को समर्पित था। यह गीत तब मशहूर हुआ जब लता मंगेशकर ने इसे नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस के अवसर प...
Yashoda Agrawal
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घिर के आयीं घटायें सावन बरसे हैं,नैना तेरे दीद को फिर से तरसे हैं !घिर के आयीं घटायें सावन बरसे हैं......मन को कैसी लगन ये लगी हैकैसे प्यास जिया में जागी है,कैसे हो गया मन अनुरागी है, कैसे हो के बेचैन अब रहते हैं !घिर के आयीं घटायें सावन बरसे हैं........अजब ग़ज़...
sahitya shilpi
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Yashoda Agrawal
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1.गिरधर का मुकुट-धरोहर गुलमोहर।2.ताप सहतापीड़ा ना कहतागुलमोहर।3.मधु का स्रोतखुशी से ओत-प्रोतये कृष्णचूड़4.मोह लेता रेमोहन को भी यहगुलमोहर।5.ये स्वर्ग-पुष्पसुने राग-बहार मधुमक्खी का।-ज्योत्सना प्रदीप
Yashoda Agrawal
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1.पलाश-वन पद्मिनी का मानो जौहर-यज्ञ।2.तुम्हारी होली!शहीद हुए देखो पलाश-पुष्प।3.पलाश-वनबन गई देह येतुम्हारे बिन।4.जाने कब सेऔर किससे जलेपलाश–प्रेमी।5.लाल -पीले हैंजन्म से ही क्रोधितपलाश–पुष्प।6.पलाश-पुष्पमानो नव-वधुएँसभा में साथ।-ज्योत्सना प्रदीप
शिवम् मिश्रा
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सभी हिन्दी ब्लॉगर्स को सादर नमस्कार। कवि प्रदीपआज महान गीतकार कवि प्रदीप जी का जन्म दिवस है। अपने देशभक्ति के गीतों से हमारे मन में देशभक्ति की भावना भरने वाले कवि प्रदीप जी सदा अपने गीतों और हमारी यादों में जिंदा रहेंगे। आज उनके 103वें जन्...
Yashoda Agrawal
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हुई सुबह मुट्ठी में भर लेंगे नया आकाश । उषा किरण होता नव सृजनमन प्रसन्न । मुझमें बेटी सदा प्रतिबिंबित छवि इंगित ।तपती धूपवृक्ष की घनी छाँव देती ठंडक ।सजाई अर्थी राग ,द्वेष व दंभ/ सधा जीवन । प्रीत के रंग अप...
sanjiv verma salil
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समाचार:लघुकथा जीवन का दर्पण- प्रदीप शशांक *जबलपुर, ११-१२-२०१६. स्थानीय भँवरताल उद्यान में विश्व वाणी हिंदी संस्थान जबलपुर तथा अभियान जबलपुर के तत्वावधान में नवलेखन संगोष्ठी के अंतर्गत मुख्य वक्ता वरिष्ठ लघुकथाकार श्री प्रदीप शशांक ने 'लघुकथा के उद्भव और विकास'...
sanjiv verma salil
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बुन्देली लघुकथाएँप्रदीप शशांक १. लालच -------------'काय ,सुनो तो जरा, हमका ऊ कलेंडर मा देखेके बतावा कुम्भ ,सोमवती अमावस्या ,कारतक पूरनिमा कौनो तारीख मा पड़ रई आय?'गोपाल ने अपनी बीवी की ओर अचरज से देखत भये पूछी -- 'तुमको का करने है ई सब जानके ?' कछु नई...