ब्लॉगसेतु

राजीव सिन्हा
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    जागता है खुदा और सोता है आलम।     कि रिश्‍ते में किस्‍सा है निंदिया का बालम।।     ये किस्सा है सादा नहीं है कमाल।।     न लफ्जों में जादू बयाँ में जमाल।।     सुनी कह रहा हूँ न देखा है हाल।।     फिर भी न शक के उठाएँ सवाल।।     कि किस्‍से पे लाजिम है सच का असर।।  ...
राजीव सिन्हा
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शाम को गोधूलि की बेला, कुली के सिर पर सामान रखवाये जब बाबू राधाकृष्ण अपने घर आये, तब उनके भारी-भारी पैरों की चाल, और चेहरे के भाव से ही कुंती ने जान लिया कि काम वहाँ भी नहीं बना। कुली के सिर पर से बिस्तर उतरवाकर बाबू राधाकृष्ण ने उसे कुछ पैसे दिए। कुली सलाम करके चल...
राजीव सिन्हा
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इस ‘आज’, ‘कल’, ‘अब’, ‘जब’, ‘तब’ से सम्पूर्ण असहयोग कर यदि कोई सोचे क्या, खीज उठे कि इतना सब कुछ निगलकर – सहन कर इस हास्यास्पद बालि ने काल को क्यों बाँधा। इस ‘भूत’, ‘भविष्य’, ‘वर्तमान’ का कार्ड – हाउस क्यों खड़ा किया, हाँ, यदि सोचे क्या, खीज उठे कि कछुए...
राजीव सिन्हा
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अनुमानित समय : 17 मिनटबहार फिर आ गई। वसन्त की हल्की हवाएँ पतझर के फीके ओठों को चुपके से चूम गईं। जाड़े ने सिकुड़े-सिकुड़े पंख फड़फड़ाए और सर्दी दूर हो गई। आँगन में पीपल के पेड़ पर नए पात खिल-खिल आए। परिवार के हँसी-खुशी में तैरते दिन-रात मुस्कुरा उठे। भरा-भराया घर।...
shashi purwar
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१ नज्म के बहानेयाद की सिमटी हुई यह गठरियाँ खोल कर हम दिवाने हो गए रूह भटकी कफ़िलों में इस तरह नज्म गाने के बहाने हो गए। बंद पलकों में छुपाया अश्क को सुर्ख अधरों पर थिरकती चांदनी प्रीत ने भीगी दुशाला ओढ़कर फिर जलाई बंद हिय में अलगनी इश्क के ठहरे उजाले पाश में धार स...
 पोस्ट लेवल : नवगीत गीत प्रेम
Roli Dixit
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बहुत गर्माहट देती हैंशीत ऋतु में तुम्हारी चुप्पियांजैसे किसी नवजात को माँ नेअपनी छाती में भींच रखा हो.एक अरसे के बाद तुम्हारा आनाऐसे भरता हैहमारी सर्द रातों में गर्मीजैसे किसी दुधमुँहे के तलवों परअभी-अभी की गई होगुनगुने सरसों के तेल की मालिश.छज्जे पर तुम्हारी राह त...
 पोस्ट लेवल : कविता प्रेम कविता
राजीव सिन्हा
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घुमक्कड़ी के दिनों में मुझे खुद मालूम न होता कि कब किस घाट जा लगूँगा। कभी भूमध्य सागर के तट पर भूली बिसरी किसी सभ्यता के खण्डहर देख रहा होता, तो कभी यूरोप के किसी नगर की जनाकीर्ण सड़कों पर घूम रहा होता। दुनिया बड़ी विचित्र, पर साथ ही अबोध और अगम्य लगती, जान पड़ता ज...
राजीव सिन्हा
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पूत-सलिला भागीरथी के तट पर चन्द्रालोक में महाराज चक्रवर्ती अशोक टहल रहे हैं। थोड़ी दूर पर एक युवक खड़ा है। सुधाकर की किरणों के साथ नेत्र-ताराओं को मिलाकर स्थिर दृष्टि से महाराज ने कहा-विजयकेतु, क्या यह बात सच है कि जैन लोगों ने हमारे बौद्ध-धर्माचार्य होने का जनसाधा...
राजीव सिन्हा
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वो चेहरे। कौन-से चेहरे? कौन-सा चेहरा? जो जीवन-भर चेहरों की स्मृतियाँ संग्रह करता आया है, उसके लिए यह बहुत कठिन है कि किसी एक चेहरे को अलग निकालकर कह दे कि यह चेहरा मुझे नहीं भूलता : क्योंकि जिसने भी जो चेहरा वास्तव में देखा है, सचमुच देखा है, वह उसे भूल ही नहीं सकत...
राजीव सिन्हा
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बाबू कुन्दनलाल कचहरी से लौटे, तो देखा कि उनकी पत्नीजी एक कुँजड़िन से कुछ साग-भाजी ले रही हैं। कुँजड़िन पालक टके सेर कहती है, वह डेढ़ पैसे दे रही हैं। इस पर कई मिनट तक विवाद होता रहा। आखिर कुँजड़िन डेढ़ ही पैसे पर राजी हो गई। अब तराजू और बाट का प्रश्न छिड़ा। दोनों प...