ब्लॉगसेतु

अनीता सैनी
12
जलती देह नारी की विधाता,  क्रूर  निर्मम प्राणी  रचाया । क्रोध द्वेष दंभ हृदय में इसके, क्यों अगन तिक्त भार बढ़ाया ।सृजन नारी का सृजित किया है, ममत्त्व वसुधा पर लावन को।दुष्ट अधर्मी मानव जो पापी,आकुलता सिद्धी पावन को।भद्र भाव का करत...
Roli Dixit
154
प्रेयसी बनना चाहती है वोपर बिना पहले मिलनप्रेम सम्भव ही कहाँ,सुलझाते हुए अपने बालों की लटेंउसे प्रतीक्षा होती है उस फूल कीजो उसका राजकुमार लाएगाजूड़े में लगाने को.चढ़ाते हुए चूल्हे पर चायवो मिठास ढूँढती हैकि उन हाथों में जाने से पहले प्यालामद्धम आँच के ज्वार भाटे सहे...
 पोस्ट लेवल : कविता प्रेम कविता
Roli Dixit
154
वो यायावर थावो स्वयं के खोल में भीएक कोना ढूँढने वाली निर्मोहीजाने कैसे प्रेम हो गयाअब वो अपने आप मेंग़ुम सा शांतिदूतऔर वोउसके मन के ब्रह्मांड को खोजतीअनथक घुमक्कड़.
 पोस्ट लेवल : कविता प्रेम कविता
अनीता सैनी
12
खिल उठेगा आँचल धरा का, मानव मन अब अवसाद न कर, चहुओर प्रेम पुष्प खिलेंगें समय साथ है आशा तू धर।  पतझर पात विटप से झड़ते, बसँत नवाँकुर खिल आएगा, खुशहाली भारत में होगी  गुलमोहर-सा खिल जाएगा, बितेगा फिर समय ये भारी,  संय...
Roli Dixit
154
सुनो ना!ये जो प्रेम हैमेरी दसों उँगलियों के पोरों परचक्र बना गया हैअब तो मानोगे नाप्रेम में मेरा राजयोग चल रहा.अगर दाएं पाँव का अँगूठा छोड़ दूँतो उन नन्हीं उँगलियों में भीसारे के सारे चक्र हैंअब तो ले चलोगे नाअपने साथ किसी दूसरे ग्रह परतब तक मैंये अंतिम चक्र भी बनात...
Roli Dixit
154
मैं वो शहर हूँजिसके किनारे दर्द की झील बहती हैअक़्सर प्रेमी युगलएक-दूसरे को सांत्वना देते दिख जाते हैं.मैं वो पेड़ नहीं बनना चाहताजिनकी शाखों में उनके प्रेम को अमरत्व मिलेइससे बेहतर है, मैं वो कागज़ बनूँजिस पर प्रेम न पा सकने कीवो अपनी रोशनाई उड़ेल दें...अमर होना चाहूँ...
अनीता सैनी
12
प्रीत व्यग्र हो कहे राधिका, घूँघट ओट याद हर्षाती ।मुँह फेरुँ तो मिले कान्हाई, जीवन मझधारे तरसाती ।।साँझ-विहान गुँजे अभिलाषा, मनमोहिनी- मिलन को आयी। प्रिये की छवि उतरी नयन में, अश्रुमाला गिर हिय समायी। जलती पीड़ा दीप माल-सी,  ...
अनीता सैनी
12
पी प्रीत में कान्हा से कहे राधिका, घूँघट ओढ़े  याद हर्षाया करती है, मुँह फेरुँ राह में मिले मनमौजन-सी, जीवन मझधार में रुलाया करती है।  साँझ-सवेरे गुँजित डोले अभिलाषा, मनमोहिनी मिलने मुझसे आयी, परछाई प्रिये की  उतरी नयनन में,&n...
Roli Dixit
154
तुमसे मिलते हीमैंने पहला शब्द ब्रह्मांड बोला थाऔर तुमने असुरतुम अविश्वास के अनुच्छेद में टहलते रहेऔर मैं विश्वास की सूची मेंतुमने पलाशों का झड़ना देखाऔर मैंने गुलमोहर का खिलनामेरे लिए बहुत आसान है कहनाकि तुम सही नहीं होफ़िर भी पूरे यक़ीन से कहती हूँ मैंकि तुम ही सही ह...
Roli Dixit
154
अग़र आज की रात मैं न रहूँतो क्या तुम लौटा कर ला सकोगे वो दिनजो अपना अस्तित्व खो चुके हैं.कभी सोचा, कैसे सोती हूँ मैं उन रातों कोजो तुमने अपनी स्याही से सींची थीं...और भयावह हो जाता हैमेरी आँखों से भीगकर सन्नाटे का शोर...दर्द भी इन दिनों अपनी फ़ाक़ाकशी में हैकुछ नहीं त...
 पोस्ट लेवल : कविता प्रेम