ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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मेरी बस थोड़ी-सी आँखें जल रही हैं और थोड़ी-सी नींद गायब है। बाकी सब ठीक है, जैसे देश में सब ठीक है। इस व्यंजना को समझने के लिए जादा दिमाग लगाने और घोड़े दौड़ाने की ज़रूरत नहीं है। यह कोई फ़िलर पोस्ट नहीं है जो इतने दिन के बाद आज रात उस खाली स्थान को भरने की गरज से लिखी ज...
Shachinder Arya
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कभी-कभी सोचता हूँ, जिस तरह ख़ुद को बेतरतीब लगने की कोशिश हम सब कभी-न-कभी अपने अंदर करते रहते हैं, उनका सीधा साधा कोई मतलब नहीं निकलता। यह बिलकुल वैसी ही बात है जैसे लिखने का ख़ूब मन हो और तभी प्यास लग जाये। पानी की बोतल कमरे में दूर रखी है। इसलिए उठना पड़ेगा। पर यकायक...
Shachinder Arya
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तबीयत कल के मुक़ाबले काफ़ी दुरुस्त है। बस अब मन ठीक करना रह गया है। अभी इतनी उम्र नहीं हुई पर बचपन की यादें अब गड्ड-मड्ड होने लगी हैं। मुझे बचपन की कहानियाँ पढ़ना पसंद हैं, जैसी उदय प्रकाश ने लिखी हैं। तिरीछ या डिबिया या मौसा जी या ऐसी बहुत। शायद ख़ुद की नहीं लिख पाया...
Shachinder Arya
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उस इमारत का रंग लाल है। अंग्रेजों के जमाने की। अभी भी है। ख़स्ताहाल नहीं हुई है। उसकी देखरेख करने वाले हैं। किसी लॉर्ड ने इसका शिलान्यास किया होगा। आज़ादी से पहले। कई बार उसे पत्थर को पढ़ा है, पर अभी याद नहीं है। यहाँ ख़ूब बड़े-बड़े कमरे हैं। जीने भी शानदार सीढ़ियों के सा...
Shachinder Arya
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अगस्त बाईस तारीख। दिल्ली में बारिश, बारिश कहने लायक भी नहीं हुई है। उमस कम है पर आसमान से बूँदें भी नहीं गिर रहीं। सब इंतज़ार में हैं। पेड़, बिरवे, मोर, चिरिया, पंछी, मिट्टी, घास, भूत परेत सब। महिना ख़त्म होने को है और करने के लिए कुछ नहीं है। ऐसा मन सोचता है, पर कई स...
Shachinder Arya
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गाँधी जयंती के ठीक एक दिन बाद। साल दो हज़ार बारह। राजकमल, दरियागंज जाकर कई किताबें साथ ले आया। उसी में एक किताब थी डॉ. तुलसी राम की ‘मुर्दहिया’। किताबें इत्मीनान माँगती हैं। थोड़ा रुककर साथ चलने का धैर्य। आहिस्ते से आमने सामने बैठने का खालीपन। मुड़कर वापस लौट आने की ह...
Shachinder Arya
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वहीं हैं, जहाँ हम थे। यहीं अपनी दिल्ली में। कहीं गए नहीं हैं। जिसका अपना कोई मौसम नहीं। जिसकी जमा पूँजी अब सालभर गरमी ही रह गयी है। किसी काम लायक नहीं छोड़ती। अलसाए से दिन। उतनी ही बोझिल-सी रातें। बीच में शामें तपते सूरज से बचाती कम, उमस में लिपटे तौलिये जैसे निचोड़त...
Shachinder Arya
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कल बस इतना कहा था किताबें पढ़ना छोड़ दिया है। यह कहीं नहीं लिखा के उन्हे खरीदना भी बंद कर दिया है। शायद उन्हे अभी इकट्ठा कर, कभी इत्मीनान से कहीं बैठकर कहीं से भी पढ़ने लग जाऊँ। यह किन अर्थों में विरोधाभासी व्याघातक बात है, पता नहीं। शायद हम सब इन्ही के भीतर बनते-बिगड़...
Shachinder Arya
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‘ये आँखें हैं तुम्हारीतकलीफ का उमड़ता हुआ समंदर,इस दुनिया को /जितनी जल्दी हो /बदल देना चाहिए ’राकेश न मालुम कितनी दफ़े इन पंक्तियों को दोहराता रहा है। उसके दिमाग में लगे संगमरमर के पत्थर पर खुदी हुई हो जैसे। एक वक्तव्य की तरह। पर कभी उनकी कविताएँ नहीं पढ़ीं। कभी मन न...
Shachinder Arya
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कुछ ऐसी जगहें होती हैं जहाँ हम ख़ुद होते हैं। अपने आप में बिलकुल नंगे। बिलकुल अकेले। बेपरदा। बेपरवाह। लिखने के पहले, लिखने के बाद, हम कुछ-कुछ बदल रहे होते हैं। शायद ख़ुद को। अपनी लिखी उन बातों को। जो चाहकर भी किसी से नहीं कह पाये। कहते-कहते रुक से गए। रुक गए उन्हे सब...