ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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पुरानी दिल्ली, दरियागंज। किताबों की ज़िंदगी भी कैसी होती है। कभी ऐसा भी होता है, हम अचानक उस किताब तक पहुँच जाते हैं, जो इसी शहर में न जाने किसकी अलमारी में, मेज़ पर, कहीं अलगनी पर टंगे झोले में कब से पड़ी रही होंगी। फ़िर एक दिन आया होगा, जब उनकी कीमत मूल्य विहीन होकर...
Shachinder Arya
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खिड़की के बाहर बारिश की बूँदें लगातार छत पर गिर रही हैं। छत की फ़र्श पर नयी बूँद आते ही पुरानी बूँद अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में लग जाती है। उन सबको पता है, जब बौछार तेज़ हो जाएँगी तब इस संघर्ष का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। मौसम इतना पानी गिरने के बाद भी ठंडा न...
Shachinder Arya
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1. खाली पन्ने डायरी। आखिरी पन्ना। तारीख़ चौबीस अप्रैल। इसके बाद के सारे पन्ने खाली। बिलकुल सफ़ेद। आज कितने दिन हो गए? अभी गिने नहीं। पर तीन दिन बाद पूरा महिना हो जाएगा। कहीं कुछ नहीं लिखा। ऐसा कैसे हो गया। पता नहीं। बस लगता है, जैसे दिनों को रात के पहिये लग गए हों। स...