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डा. सुशील कुमार जोशी
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कुछ हंसते हंसते कुछ रो धो कर अपना घर अपनी दीवार रहने दे सर मत मार अपनी गाय अपनी गाय का अपना गोबरगोबर के कंडे खुद ही बनाये गये अपने ही हाथों से हाथ साफ धोकरअपना ही घर अपने ही घर की दीवारकंडे ही कंडेअप...
डा. सुशील कुमार जोशी
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जन्म लेने के साढ़े पाँच दशक से थोड़ा ऊपर जा कर थोड़ा थोड़ा अब समझ में आने लगे हैं मायने कुछ महत्वपूर्ण शब्दों के ना माता पिता सिखा पाये ना शिक्षक ना ही आसपास का परिवेश और ना ही समाज ये भी पता नहीं लग पाया कि ये कुछ शब्द निर्णय करेंगे अस्तित्व का होने या ना होने के बीच...
डा. सुशील कुमार जोशी
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कल का लिखा क्या बिक गया सारा आज फिर से उसी पर किसलिये वही कुछ लिख लारा दुबारा देख वो लिख लारा घड़ियाँ सारी समय सबको जो आज सबका दिखारा समझ पीठ में लगी चाबियाँ अपनी टिक टिक की दूर कहीं कहाँ जा कर छुपारा क्यों नहीं पूछ कर ही लिख लेता किसी से कुछ उसी&nbsp...
डा. सुशील कुमार जोशी
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लिखना जरूरी है तरन्नुम में मगर ठगे जाने का सारा बही खाता हिसाब कौन जानता है सुर मिले और बन पड़े गीत एक धुप्पल में कभी यही बकवास आज ही के दिन हर साल ठुमुकता चला आता है पुराने कुछ सूखे हुऐ घाव कुरेदने फिर एक बार ये अहसासभूला जाता है ताजिंदगी ठगना खुदा तक को&...
डा. सुशील कुमार जोशी
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लिखना लिखाना ठीक है सब लिखते हैं लिखना भी जरूरी है सही है गलत कुछ कहीं वैसे भी होता ही नहीं है वहम है है कह लेने में कोई बेशर्मी भी नहीं है कुछ लेखक होते हैं पैदायशी होते हैं बुरा भी नहीं है कुछ लेखक पैदा नहीं होते है माहौल बना देता है क्या किया जा सकता है कहना नही...
डा. सुशील कुमार जोशी
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बहुत कुछ है लिखने के लिये बिखरा हुआ समेटना ठीक नहीं इस समयरहने देते हैंहोना कुछ नहीं है हिसाब का बेतरतीब ला कर और बिखेर देते हैं बहे तो बहने देते हैंदीमकें जमा होने लगी हैं फिर सेनये जोश नयी...
डा. सुशील कुमार जोशी
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बकवास करने का अपना मजा और अपना एक नशा होता है किसी की दो चार लोग सुन देते हैं किसी के लिये मजमा लगा होता है नशा करके बकवास करने वाले को उसके हर फायदे का पता होता है नशा करता है एक शराबी मगर पीना पिलाना उसके लिये जरूरी होता है कहीं कुछ नहीं से निकाल कर...
डा. सुशील कुमार जोशी
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तमन्ना है कई जमाने से आग लगाने की आदत पड़ गयी  मगर अब तो झक मारते रद्दी कागज फूँक राख हवा में उड़ाने की लकीरें हैं खींचनी आसमान तक पहुँचाने की कलमें छूट गयी नीचे मगर हड़बड़ी में ऊपर जाने की आदत पड़ गयी भूलने की कहते कहते झोला उठाने की लि...
डा. सुशील कुमार जोशी
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एक जूता मार रहा है नहीं देखना है कुछ नहीं कहना है एक जूता खा रहा है नहीं देखना है कुछ नहीं कहना है दूर दर्शन दिखा रहा है दिखा रहा होगा बस देख लेना है अखबार में छप गया है छपा दिया ग...
डा. सुशील कुमार जोशी
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हर समय कुछ ना कुछ किसी पर लिखा ही जाता है क्यों लिखा जाये किस के लिये लिखा जाये अलग बात है पर प्रश्न तो एक सामने से आकर खड़ा हो ही जाता है रोकते रोकते हुऐ फिर भी ज्वालामुखी फटने की कगार पर होने के आसपास थोड़ा सा लावा आदममुख से बाहर निकल कर आ जाता है  माफ करेंगे...