फटी क़मीज़ की बेतरतीब तुरपन, आलम मेहनत का दिखाने लगे, देख रहे  गाँव के गलियारे, वो हालत हमारी भरी चौपाल में सजाने लगे | सिमटने लगी कोहरे की चादर, उनके चेहरे भी नज़र आने लगे,  जल्द-बाज़ी में जनाब ने की थी लीपापोती, अब वे दर्...