ब्लॉगसेतु

ललित शर्मा
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कुंए से पानी भरतीजुगरी को देखता था मैंबचपन से /उसके पीछेदौड़ता चला जाता था मैनिरंतरता का पैमाना थी वहभैंस की सानी व दूध से लेकरपीसने तकजग्गू के खाने कपड़े से लेकरसुक्खी के स्कूल जाने तकचलती रहती वह महामाया थी वह /माँ थी वह उपलों की थाप की लय से सरकंडों की तान तक उ...
अविनाश वाचस्पति
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मई महीनेकी गरमी भरी दोपहर थी.... घर से कही बाहर निकलने का तो सवालही नही उठता था।....सोचा कुछ दराजें साफ कर लू। कुछ कागजात ठीकसे फाइलोमे रखे जाएँ तो मिलनेमे सुविधा होगी....मैं फर्शपे बैठ गई और अपने टेबल की सबसे निचली दराज़ खोली। एक फाइलपे लेबल था,"ख़त"। उसे खोलके द...
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मेरी गुड़िया जब से, मेरे जीवन में आयी हो। सूने घर आँगन में मेरे, नया सवेरा लायी हो। पतझड़ में बन कर बहार, मेरे उपवन में आयी हो। गुजर चुके बचपन को मेरे, फिर से ले आायी हो। सुप्त हुई सब इच्छाओ को, तुमने पुनः जगाया। पानी को मम कहना, मुझको तुमने ही सिखलाया। तुमने...
 पोस्ट लेवल : बचपन
girish billore
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 पोस्ट लेवल : बचपन की यादें
girish billore
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