ब्लॉगसेतु

शिवम् मिश्रा
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“भाई! तुमने मुझे यहाँ क्यों बुलाया है?””मेरे यहाँ आना तुम्हारी शान के ख़िलाफ़ है और तुम्हारे यहाँ जाना मेरे उसूल के ख़िलाफ़. हम दोनों कहीं और ही मिल सकते थे.””हम दोनों कहीं और नहीं, सिर्फ़ यहीं मिल सकते थे. हमारे रास्ते एक दूसरे से चाहे कितने भी अलग क्यों न हो जाएँ, हमा...
kumarendra singh sengar
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सड़क की भीड़-भाड़ के बीच रिक्शा आहिस्ते-आहिस्ते आगे बढ़ता जा रहा है. रिक्शे पर कोई सवारी नहीं, उसे चलाने वाला कोई बड़ी उम्र का व्यक्ति नहीं वरन दो छोटे-छोटे मासूम से बच्चे हैं. उनकी उम्र बमुश्किल १२-१३ वर्ष की रही होगी. वे रिक्शा चला क्या रहे थे, एक प्रकार से उसे धकेल स...
VMWTeam Bharat
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कृपया ध्यान दे ...!मधुलेश पाण्डेय “निल्को” की यह एक वयंगात्मक रचना है, इसका उद्देशय किसी तो ठेस पहुचाना बिलकुल नहीं है।ये कविता पढ़ना माना एक जुर्म है, पर इस जुर्म में किसी का मुंह काला नहीं होता | (डोंट वरी)यह एक करारा जवाब है जो कहते है की आलू...
kumarendra singh sengar
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अनिश्चय हावी है, हताशा हावी है, निराशा जारी है, इंसान का मरना जारी है. इस हावी रहने में, बहुत कुछ जारी रहने में सबसे बुरा है सपनों का मरते जाना, विश्वास का मिटते जाना. यांत्रिक रूप से गतिबद्ध ज़िन्दगी नितांत अकेलेपन के साथ आगे बढ़ती दिखती है किन्तु आगे बढ़ती सी लगती न...
kumarendra singh sengar
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बच्चों की परीक्षाएँ आरम्भ हो चुकी हैं और उनके अभिभावकों द्वारा बालमन पर अतिरिक्त दबाव भी डाला जाने लगा होगा. सार्वजनिक रूप से भले ही अभिभावकों द्वारा इसे स्वीकार न किया जाये किन्तु आज का सत्य ये है कि अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों पर प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष दबाव बहुत...
शिवम् मिश्रा
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नमस्कार साथियो, देश में चल रही तमाम उथल-पुथल के बीच बच्चों की परीक्षाएँ भी आरम्भ हो चुकी हैं. मासूम बच्चों से लेकर जिम्मेवार युवा तक अपने-अपने स्तर की परीक्षाओं में तन्मयता से संलग्न हैं. उन सभी को शुभकामनायें देते हुए उनके सुखद, उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए कु...
मनोज कुमार  भारती
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भाग-1ब्राह्मण का बेटा घर की छाया तले,नदी के किनारे,नावों के निकट धूप में साल और अंजीर की छांव में सिद्धार्थ ,ब्राह्मण का सुंदर बेटा, अपने मित्र गोविंदा के संग पला-बढ़ा। नदी किनारे उसके  पवित्र स्नान और पवित्र बलि-कर्म करते हुए भी सूर्य ने उसके छरहरे कंधों...
अर्चना चावजी
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 पोस्ट लेवल : मायरा बचपन विडियो
kumarendra singh sengar
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बचपन को मानव जीवन का सर्वाधिक सुखद कालखंड माना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि यही वो अवस्था होती है जबकि किसी तरह की कोई परेशानी मनुष्य को नहीं होती है. न घर की समस्या, न बाजार-हाट की चिंता. बेफिक्री में बस खेलकूद, मस्ती, सैर-सपाटा करना और मासूमियत के साथ सभी तरह की श...
दुर्गेश चन्द्रा
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बचपन में पढ़ा था.....काक चेष्टा, बको ध्यानं,स्वान निद्रा तथैव च अल्पहारी, गृहत्यागी,विद्यार्थी पंच लक्षणं।कुछ सीखा की नहीं इतना तो नहीं पता लेकिन ,जब भी सोना होता है स्वान की तरह हि होता है। जो किसी सज़ा से कम नहीं है,कोई  नींद के बीच अगर थोड़ा भी आवाज़ कर दे...
 पोस्ट लेवल : बिस्तर बचपन सुकून