ब्लॉगसेतु

Sanjay  Grover
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कृश्न चंदर की एक कहानी थी ‘गड्ढा’। एक आदमी ऐसे गहरे गड्ढे में गिर जाता हैं जहां से दूसरों की मदद के बिना निकलना संभव नहीं है। लोग आते हैं, तरह-तरह की बातें करते हैं, अपना टाइम पास करते हैं, मनोरंजन करते हैं, सुबह से शाम हो जाती है पर कोई उसे गड्ढे से निकालने का नाम...
sanjiv verma salil
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नवगीत:संजीव.बदलावों से क्यों भय खाते?क्यों नहाथ, दिल, नजर मिलाते??.पल-पल रही बदलती दुनियादादी हो जाती है मुनियासात दशक पहले का तेवरहो न प्राण से प्यारा जेवरजैसा भी है सैंया प्याराअधिक दुलारा क्यों हो देवर?दे वर शारद! नित्य नया रचभले अप्रिय हो लेकिन कह सचत...
VMWTeam Bharat
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जुड़ते -टूटते धागों ने ,जलते बुझते आगों ने ,बनते बिगड़ते रागों ने ,समाज के विषधर नागों नेपद-निशान को किसने मोड़ दियापथ " निशान " का किसने मोड़ दिया ||१पकड़ते छूटते हाथों नेमिलते बिछड़ते साथों नेबनती बिगडती बातों नेमुंह मांगी सौगातों नेपद-निशान को किसने मोड़ दियापथ " निशान...
अजय  कुमार झा
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.....मित्र राजेश सरोहा की एक रिपोर्ट नवभारत टाईम्स दिल्ल्ली हाल ही  में खबरनवीस मित्र राजेश सरोहा ने नवभारत टाईम्स दिल्ली संस्करण में ये खबर प्रमुखता से प्रकाशित की | आंकड़े बता रहे हैं कि ट्रैफिक , लगातार होती सड़क दुर्घटनाओं और इनमें हो रहे इजाफे के बावजू...
Sanjay  Grover
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व्यंग्यमैं सिद्धू को देखता हूं।पता नहीं वे कॉमेडी शो की वजह से ऐसे हैं या कॉमेडी शो उनकी वजह से ऐसे हो गए हैं!आजकल कॉमेडी शो में लोग हंसने के बजाय तालियां बजाने लगे हैं। हो सकता है हंसीं की शॉर्टेज हो, हो सकता है हंसने से थकान होती हो, गला दुखता हो ; और तालियों से...
Sanjay  Grover
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‘चुन्नी कहां हैं ? मेरी चुन्नी कहां है ?’ बाहर से घंटी बजती और माताजी घबरा जाते ; हालांकि सलवार-कमीज़ पहने हैं, स्वेटर पहने हैं, ज़ुराबें पहने हैं, कई-कई कपड़े पहने हैं मगर संस्कार, डर, कंडीशनिंग....मैं तो कहूंगा कि बुरी आदत, थोपा गया आतंक.... और चुन्नी भी कई बार बिलक...
केवल राम
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गत अंक से आगे....मैं जहाँ तक समझ पाया हूँ कि दुनिया को बदलने का प्रयास करने से पहले हम खुद को बदलने का प्रयास करें. जब एक-एक करके हर कोई खुद को मानवीय भावनाओं के अनुरूप ढालने का प्रयास करेगा तो दुनिया का स्वरुप स्वतः ही बदल जायेगा. लेकिन आज तक जितने भी प्रयास हुए ह...
केवल राम
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गत अंक से आगे...हम अपने आसपास की चीजों को जब समझने की कोशिश करते हैं तो हमें समझ आता है कि इस समाज में कितना कुछ है जिसका हमारी जिन्दगी से कोई सीधा सरोकार नहीं है, और कितना कुछ ऐसा है जिसे हमें अपनाने की जरुरत है. अमूमन तो ऐसा होता है कि हम अपने सामाजिक परिवेश में...
सुशील बाकलीवाल
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होंठो पर तो है हँसीफिर आँखें नम क्यों  हैपास है हर ख़ुशीफिर भी कुछ गम क्यों है. . .राहें तो बहुत आती है नज़रपर जिस पे चलना है वो अनजान क्यों हैबड़ी कठिन है सच की डगरझूँठ की राह आसान क्यों है. . .आज गैर अपने है और अपने गैर हो गएसमझदार होकर भी हम नादान क्यों हैपास...
केवल राम
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गत अंक से आगे... मन वचन और कर्म के पहलुओं को समझाने की कोशिश कई तरीकों से की जाती. गाँव के बुजुर्ग गाँव के हर बच्चे के साथ अपने बच्चे जैसा व्यवहार करते, इसलिए बच्चों के पास कोई अवकाश नहीं होता था कि वह किसी के साथ उदंडता से पेश आये. अगर कभी ऐसी भूल हो भी जाती थी तो...