ब्लॉगसेतु

sanjiv verma salil
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सॉनेटसदा सुहागिन•खिलती-हँसती सदा सुहागिन।प्रिय-बाहों में रहे चहकती।वर्षा-गर्मी हँसकर सहती।।करे मकां-घर सदा सुहागिन।।गमला; क्यारी या वन-उपवन।जड़ें जमा ले, नहीं भटकती।बाधाओं से नहीं अटकती।।कहीं न होती किंचित उन्मन।।दूर व्याधियाँ अगिन भगाती।अपनों को संबल दे-पाती।जीवट क...
sanjiv verma salil
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मुक्तिकाखोली किताब।निकले गुलाब।।सुधियाँ अनेकलाए जनाब।।ऊँची उड़ान भरते उकाब।।है फटी जेबफिर भी नवाब।।छेड़ें न लोगओढ़ो नकाब।।दाने न चारदेते जुलाब।।थामो लगामपैरों रकाब।।***४-२-२०२२मुक्तिका•मुस्कुराने लगे।गीत गाने लगे।।भूल पाए नहींयाद आने लगे।।था भरोसा मगरगुल खिलान...
sanjiv verma salil
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'शाम हँसी पुरवाई में' विमोचन पर मुक्तिकाआचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'*शाम हँसी पुरवाई में। ऋतु 'बसंत' मनभाई में।।झूम उठा 'विश्वास' 'सलीम'।'विकल' 'नयन' अरुणाई में।।'दर्शन' कर 'संतोष' 'अमित'।  'सलिल' 'राज' तरुणाई में।।छंद-छंद 'अमरेंद्र' सरस्। 'प्...
शिवम् मिश्रा
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 युवा क्रांतिकारी व देशप्रेमी श्री बसंत कुमार बिस्वास (6 फ़रवरी 1895 - 11 मई 1915) बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारी संगठन " युगांतर " के सदस्य थे। उन्होंने अपनी जान पर खेल कर वायसराय लोर्ड होर्डिंग पर बम फेंका था और इस के फलस्वरूप उन्होंने 20 वर्ष की अल्पायु में...
रवीन्द्र  सिंह  यादव
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 जीवन के रीते तिरेपन बसंतमेरे बीते तिरेपन बसंत  बसंत की प्रतीक्षा का हो न कभी अंतप्रकृति की सुकुमारता का क्रम-अनुक्रम  चलता रहे अनवरत अनंत नई पीढ़ी से पूछो-कब आया बसंत? कब गया बसंत...? &...
देवेन्द्र पाण्डेय
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यूं ही नहीं आता वसंतलड़नी होती है, लंबी लड़ाईधूप कोकोहरे के साथ।लगने लगता हैहार गया कोहरातभी नहीं दिखतीधूपलगने लगता हैगई ठंडीछाने लगता हैघना कोहरायूँ ही नहीं आता मगर तय हैकोहरे को हराकरआता है एक दिनवसंत।
 पोस्ट लेवल : बसंत कविता वसंत
sanjiv verma salil
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 बुधिया लेता टोह : चीख लगे विद्रोहपुरोवाक स्वातंत्र्योत्तर भारतीय साहित्य छायावादी रूमानियत (पंत, प्रसाद, महादेवी, बच्चन), राष्ट्रवादी शौर्य (मैथिली शरण गुप्त, माखन लाल चतुर्वेदी, दिनकर, सोहनलाल द्विवेदी) और प्रगतिवादी यथार्थ (निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्...
sanjiv verma salil
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भूमिका: बुधिया लेता टोह : चीख लगे विद्रोहआचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'स्वातंत्र्योत्तर भारतीय साहित्य छायावादी रूमानियत (पंत, प्रसाद, महादेवी, बच्चन), राष्ट्रवादी शौर्य (मैथिली शरण गुप्त, माखन लाल चतुर्वेदी, दिनकर, सोहनलाल द्विवेदी) और प्रगतिवादी यथार्थ (निराला, न...
sanjiv verma salil
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पर्यावरण गीत:किस तरह आये बसंतसंजीव*मानव लूट रहा प्रकृति कोकिस तरह आये बसंत?...*होरी कैसे छाये टपरिया?धनिया कैसे भरे गगरिया?गाँव लील कर हँसे नगरिया,राजमार्ग बन गयी डगरियाराधा को छल रहा सँवरियासुत भूला माँ हुई बँवरियाअंतर्मन रो रहा निरंतरकिस तरह गाये बसंत?...*सूखी नद...
 पोस्ट लेवल : बसंत पर्यावरण गीत
sanjiv verma salil
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आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ - मानवीय संवेदनाओं के कविआचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी का नाम अंतर्जाल पर हिंदी साहित्य जगत में विशेष रूप से सनातन एवं नवीन छंदों पर किये गए उनके कार्य को लेकर अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है, गूगल पर उनका नाम लिखते ही सैकड़ों के संख्या मे...