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Shachinder Arya
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वर्माजी देखने में साधारण से मास्टरजी लगते हैं। जैसे विनोद कुमार शुक्ल की कविता से अभी-अभी बाहर निकले हों। जो उनके घर कभी नहीं आएँगे, वह उनसे मिलने उनके पास चले जायेंगे। पास पहुँचकर वह सिर्फ़ हालचाल लेंगे। और कुछ नहीं कहेंगे। ऐसे ही वे हमारे बचपन में मास्टर बनकर आए।...
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जिस उम्र में बाबा हमारी उम्र के रहे होंगे, तब पता नहीं कितने गरीब रहे होंगे। कहते हैं, गरीबी एक दिन सबको लील जाती है। यही आज सुबह उन्हे अपने साथ कहीं ले गयी है और अभी तक उन्हे वापस नहीं लाई है। घूमने के शौक़ीन तो वे शुरू से ही रहे हैं, चल पड़े होंगे। बेधड़क। बिन सोचे...
Shachinder Arya
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यह बात मुझे बहुत साल बीत जाने के बाद समझ आई। या इसे ऐसे कहें के उन बातों को समझने लायक समझ उमर के साथ ही आती। उससे पहले समझकर कुछ होने वाला भी नहीं था। मौसी हमारी मम्मी से छोटी थीं या बड़ी कोई फरक नहीं पड़ता। मैं बहुत छोटा रहा होऊंगा, जब एकदिन वह मर गईं। मेरे हिस्से...
Shachinder Arya
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बचपन की यादों में सबसे अनछुई याद है नानी के घर की। हमलोग इसी मौसम में झुलसती गरमियाँ अपने गाँव में बिताने हरसाल लौट आते। वहाँ हमें छोड़कर सब रहा करते। वहाँ बस, हम ही नहीं हुआ करते। पता नहीं हम कितने छोटे रहे होंगे जब पापा हीरो मजेस्टिक खरीदकर लाये। शायद मेरे मुंडन क...
Shachinder Arya
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सड़क किनारे कहीं दिवाल नहीं थी, इसलिए पेड़ ही दीवार है। बसों का घंटाघर। यह ढाबली, पैट्रोल पंप है। जब वह आ जाएगा, यह गुम हो जाएगी। 
Shachinder Arya
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इसे ढाबली कहते हैं, पर अभी बंद है। एक अरुण की भी है, पान की। वह बंद है, वह खुली है। जो ट्रॉली के बिलकुल पीछे खुली है,  वही बिसातखाना है। इसकी कहानी फ़िर कभी।
Shachinder Arya
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दिल्ली हमारे सपनों का शहर। हम कभी सपनों में भी दिल्ली नहीं आपाते। अगर हमारी दादी ने हमारे पापा को बाहर पढ़ने के लिए भेजा न होता। तब यहाँ रहना तो दूर, इसे कभी छू भी नहीं पाते। हम दिल्ली रोज़ सुनते, पर कभी इसे देख नहीं पाते। हम भी वहीं चार-पाँच साल पहले तुमसे शादी और द...
Shachinder Arya
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शनिवार तीस अगस्त, शाम साढ़े छह बजने के आधे घंटे बाद, लगभग सात बजे। उधर से छोटे जन का फ़ोन आया। दादी नहीं रहीं। दिमाग ठीक रहे, तब वाक्य भी ठीक आयें। पर ख़ैर। उनके ठीक होने का कोई मतलब नहीं रह गया, जिनको ठीक होना था, वो अब चली गईं। मंगलवार उन्हे लखनऊ से वापस ले आए। डॉक्...
Shachinder Arya
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बाढ़ कैसी होती है? इसके रेणु के 'ऋणजल धनजल' जैसे कई जवाब हो सकते हैं। फ़िर इसके बाहर यह कैसी भी होती हो, पर गौरव सोलंकी के फ़ेसबुक कवर पर लगी तस्वीर और वहाँ लिखी कविता की तरह बिलकुल नहीं होती। तस्वीर धुंधली है, पर लड़की दिखाई दे रही है। बगल में झोला दबाये, एक हाथ से छ...
Shachinder Arya
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इन बातों को आज इतने महीने पहले ही ‘ड्राफ़्ट’ करके ‘शेड्यूल’ कर रहा हूँ। तीन चार सपने तरतीब से लगा दिये हैं। के आगे वाले दिनों में कहीं इसे लगाना रह न जाये। भूलने वाला प्राणी नहीं हूँ, फ़िर भी.. मन कर रहा है। तारीख़ वही है जब हम सच में चारबाग़ स्टेशन के लिए चल दिये होंग...