ब्लॉगसेतु

Basudeo Agarwal
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नेताओं ने आज देश में कैसा खेल रचाया है।इनकी मनमानी के आगे सर सबका चकराया है।लूट लूट जनता को इनने भारी माल बनाया है।स्विस बैंकों में खाते रखकर काला धन खिसकाया है।।सत्ताधीशों ने देश को है बाँटा,करारा मारा चाँटा,यही तो चुभे काँटा,सुनोरे मेरे सब भाइयों,बासुदेव कवि दर्द...
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भरा साहित्य सृजकों से हमारा ये सुखद परिवार,बड़े गुरुजन का आशीर्वाद अरु गुणग्राहियों का प्यार,यहाँ सम्यक समीक्षाओं से रचनाएँ परिष्कृत हों,कहाँ संभव कि ऐसे में किसी की कुंद पड़ जा धार।1222*4*********यहाँ काव्य की रोज बरसात होगी।कहीं भी न ऐसी करामात होगी।नहाओ सभी दोस्तो...
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2*9 (मात्रिक बहर)(पदांत 'ना पहचानी', समांत 'आ' स्वर)दूजों के गुण भारत तुम गाते,अपनों की प्रतिभा ना पहचानी।तुम मुख अन्यों का रहे ताकते,पर स्वावलम्बिता ना पहचानी।।सोने की चिड़िया देश हमारा,था जग-गुरु का पद सबसे न्यारा।किस हीन भावना में घिर कर अब,वो स्वर्णिम गरिमा ना प...
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मीठा बोले भाव उभारेतोड़े वादों में नभ तारेसदा दिलासा झूठी देताए सखि साजन? नहिं सखि नेता!सपने में नित इसको लपकूँमिल जाये तो इससे चिपकूँमेरे ये उर वसी उर्वसीए सखा सजनि? ना रे कुर्सी!जिसके डर से तन मन काँपेघात लगा कर वो सखि चाँपेपूरा वह निष्ठुर उन्मादीक्या साजन? न आतंक...
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कह मुकरी काव्य की एक पुरानी मगर बहुत खूबसूरत विधा है। यह चार पंक्तियों की संरचना है। यह विधा दो सखियों के परस्पर वार्तालाप पर आधारित है। जिसकी प्रथम 3 पंक्तियों में एक सखी अपनी दूसरी अंतरंग सखी से अपने साजन (पति अथवा प्रेमी) के बारे में अपने मन की कोई बात कहती है।...
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जीव जंतु जंगम जगत, सबको समझ समान।योग क्षेम करके वहन, प्रभु ही रखते ध्यान।।राम, कृष्ण, वामन कभी, कूर्म, मत्स्य अभिधान।पाप बढ़े अवतार ले, प्रभु ही रखते ध्यान।।ब्रह्म-रूप उद्गम करे, रुद्र-रूप अवसान।विष्णु-रूप में सृष्टि का, प्रभु ही रखते ध्यान।।अर्जुन के बन सारथी, गीता...
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धरती का जो स्वर्ग था, बना नर्क वह आज।गलियों में कश्मीर की, अब दहशत का राज।।भटक गये सब नव युवक, फैलाते आतंक।सड़कों पर तांडव करें, होकर के निःशंक।।उग्रवाद की शह मिली, भटक गये कुछ छात्र।ज्ञानार्जन की उम्र में, बने घृणा के पात्र।।पत्थरबाजी खुल करें, अल्प नहीं डर व्याप्त...
Basudeo Agarwal
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मन मोहा, तन कुसुम सम तेरा।हर लीन्हा, यह भ्रमर मन मेरा।।अब तो ये, रह रह छटपटाये।कब तृष्णा, परिमल चख बुझाये।।मृदु हाँसी, जिमि कलियन खिली है।घुँघराली, लट-छवि झिलमिली है।।मधु श्वासें, मलय-महक लिये है।कटि बांकी, अनल-दहक लिये है।।मतवाली, शशि वदन यह गोरी।मृगनैनी, चपल चकित...
Basudeo Agarwal
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ब्रह्म लोक वासिनी।दिव्य आभ भासिनी।।वेद वीण धारिणी।हंस पे विहारिणी।।शुभ्र वस्त्र आवृता।पद्म पे विराजिता।।दीप्त माँ सरस्वती।नित्य तू प्रभावती।।छंद ताल हीन मैं।भ्रांति के अधीन मैं।।मन्द बुद्धि को हरो।काव्य की प्रभा भरो।।छंद-बद्ध साधना।काव्य की उपासना।मैं सदैव ही करूँ।...
Basudeo Agarwal
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तु मात प्यारी।महा दुलारी।।ममत्व पाऊँ।तुझे रिझाऊँ।।गले लगाऊँ।सदा मनाऊँ।।करूँ तुझे माँ।प्रणाम मैं माँ।।तु ही सवेरा।हरे अँधेरा।।बिना तिहारे।कहाँ सहारे।।दुलार देती।बला तु लेती।।सनेह दाता।नमामि माता।।===========लक्षण छंद:-"जगाग" राचो।'यशोदा' पाओ।।121+ गुरु+ गुरु =5 वर्ण...