ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
0
कभी होता, उसके खर्राटों से वह ख़ुद जग जाता। जग जाता के साथ लेटे सब न जग जाएँ। सबके सोते रहने पर वह उठता। उठकर बैठ जाता। बैठना, थोड़ी रौशनी के साथ होता। रात उस खयाल में ख़ुद को अकेले कर लेने के बाद खुदसे कहीं चले जाने लायक न बचता, तो ख़ूब रोता। आँसू नहीं आते। याद आती। य...
Shachinder Arya
0
रात साढ़े दस बजे के बाद। छत पर टहलते हुए। एक हाथ से कान पर फ़ोन। दूसरे से नाक पोंछते हुए। दिल्ली की ठंड ऐसे ही हरबार इन दिनों में घेर लेती। इस बार भी कश्मीर में बर्फ़ गिरने के बाद से बढ़ गयी। वापस कमरे में लौट कर सोच रहा हूँ एक ख़त लिखने बैठ जाऊँ। तुम्हारी बहुत याद आ र...
Shachinder Arya
0
मेरी बस थोड़ी-सी आँखें जल रही हैं और थोड़ी-सी नींद गायब है। बाकी सब ठीक है, जैसे देश में सब ठीक है। इस व्यंजना को समझने के लिए जादा दिमाग लगाने और घोड़े दौड़ाने की ज़रूरत नहीं है। यह कोई फ़िलर पोस्ट नहीं है जो इतने दिन के बाद आज रात उस खाली स्थान को भरने की गरज से लिखी ज...
Shachinder Arya
0
वह एकदम शांत क़िस्म की दीवारों वाला घर था। छिपकली भी आहिस्ते से उनसे चिपकी रहती और कोई जान भी न पाता। जाले दरवाज़े के पीछे छिपकर सालों से वहीं बने हुए थे। पलस्तर धीरे-धीरे अम्मा की अधीर आँखों की तरह उखड़ रहा था। सफ़ेदी को सीलन के साथ पपड़ी बने ज़माना बीत गया, किसी को को...
Shachinder Arya
0
पता नहीं अंदर ख़ुद से कितने झूठे वादे कर रखे हैं।एक में हम शादी के बाद पहली बात अकेले घूमने निकलने वाले हैं। में सारी ज़रूरी चीजों में सबसे पहले कैमरे को संभालता हूँ। जिद करके उधार ही सही नौ हज़ार का डिजिटल कैमरा ले आता हूँ। कहीं पहाड़ पर जाएँगे, तब अपनी साथ वाली तसवी...
Shachinder Arya
0
पता नहीं कभी-कभी क्या होता है, हम चाहकर भी नहीं समझ पाते। शायद तभी उन बीत गए दिनों में लौट कर उन्हें दुरुस्त करने की ज़िद से भर जाते होंगे। अगर ऐसा न होता तब मुझे भी हलफ़नामे की तरह दोबारा उन बातों पर गौर करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। सोचता हूँ, अगर मेरे मन में वह ख़याल दो...
Shachinder Arya
0
कभी-कभी सोचता हूँ हम भाग कर शादी कर लेते तो क्या होता? मेरे पास आज तक नौकरी नहीं है। इन दोनों बातों में प्रश्न-उत्तर वाला संबंध नहीं है फ़िर भी दोनों एक-दूसरे का जवाब हैं। यह दोनों बातें आपस में ऐसे गुथी हुई हैं, जैसे तुम्हारी कल शाम वाली बँधी चोटियाँ। उनमें गुथे हु...
Shachinder Arya
0
जब कुछ दिन रुक जाओ तब ऐसे ही होता है। कितनी बातें एक साथ कहने को हो आती हैं। जबकि मन सबको धीरे से कह चुका है, कह देंगे इतमिनान से। पर कौन मानने वाला है। कोई नहीं मानता। कभी-कभी जब अपने चारों तरफ़ देखता हूँ तो लगता है, उन सबमें सुस्त क़िस्म का रहा होऊंगा। कछुए जैसा। त...
Shachinder Arya
0
कोई भी उस कमरे में कभी भी दाख़िल होता, तो उसे लगता, यह कमरा एक जमाने में किसी दफ़्तर का हिस्सा रहा होगा। टूटी मेज़। धूल खाती फ़ाइलें। कोनों में पड़ी कुर्सियाँ। कटे-फटे जूते। मकड़ी के जाले। खिड़की से आती हवा। इधर-उधर बिखरे पड़े पन्ने। चूहों की लेड़ीयाँ। बजबजाता फ़र्श। फटा हुआ...
Shachinder Arya
0
कल रात इस ख़याल के दिल में उतरते जाने की देर थी कि नींद फ़िर लौट के नहीं आई। उस दृश्य को अपने सामने घटित होते देखता हूँ तो रौंगटे खड़े हो जाते हैं। रात ऐसे ही कई बार गिरफ़्त में ले लेती है। फ़िर छोड़े नहीं छोड़ती। गुप्ता जी वहीं कहीं सड़क किनारे ख़ून से लथपथ पड़े रह गए हों...