ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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मन भाग रहा है। पता नहीं क्या है, जिसके न होने से लिख नहीं पा रहा। अजीब-सी स्थिति है। कभी मन करता है, एक एक अधूरी पोस्ट खोलकर उसे पूरा करता जाऊँ। पर नहीं कर पाया। वहाँ से वर्ड में लिखने बैठा हूँ तो अब बाहर निकल कर घूम आने को जी चाह रहा है। शुक्रवार शाम पौने सात बजे...
Shachinder Arya
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कहीं कोई होगा, जो इस मौसम की ठंडक को अपने अंदर उतरने दे रहा होगा। कोई न चाहते हुए भी ऐसा करने को मजबूर होते हुए खुद को कोस रहा होगा। दुनिया में इन दो तरह के लोगों के अलावे भी कई और शैदाई होंगे, जो उन सड़कों, गलियों, अनदिखे मोड़ों पर रुककर, किसी अनजाने एहसास का इंतज़ार...
Shachinder Arya
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कितनी शामों से यह शाम ऐसे ही ठहरी हुई है। एकदम बिलकुल शांत। रुकी हुई। खिड़की से फ़र्लांग भर की दूरी पर उस अमलतास के फूलों के झर जाने के बाद से सहमी हुई पत्तियों की तरह। हम भी कहीं मिट्टी में रोपे हुए पेड़ होते तो आज तीस साल बाद कितने बड़े होकर किसी आँधी पानी में टूटकर...
Shachinder Arya
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बड़े दिनों बाद आज अपने बारे में सोचता रहा। सोचता तो हमेशा रहता हूँ। पर आज लिखने के लिए थोड़ा अलग तरह से अंदर की तरफ़ लौटने लगा। जून की तपती दुपहरे कहीं जाने नहीं देतीं। फ़िर भी दोबार निकल गया। हम लोग घंटों वहीं आर्ट्स फैकल्टी की अँग्रेजी मेहराबों के बीच में पुराने दिनो...
Shachinder Arya
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वह पुल एक शांत पुल था। किसी नदी के ऊपर नहीं। दो इमारतों के बीच हवा में टंगा हुआ-सा। वह हमारे बचपन से पता नहीं कितने सारे तंतुओं को जोड़ता एक दिन गायब होता गया। उसका अस्तित्व हमारे लिए उतना ही ज़रूरी बनता गया जितना की हमारे फेफड़ों में भरती जाती हवा। उसका चले जाना उन ध...
Shachinder Arya
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सब कुछ वैसा ही है, जैसा कभी नहीं सोचा था। इस पंक्ति के बाद एकदम से सुन्न हो गया। आगे क्या कहूँ? कुछ कहने के लिए हैं भी या ऐसे ही दोहराव में हम अपने बिगड़ने को देखते रहते हैं। कई सारी बातें हैं, जिन्हे कहना है पर समेटने का सलीका थोड़ा भूलता गया हूँ। अभी खिड़की के बाहर...
Shachinder Arya
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अँधेरा जल्दी होने लगा है। ठंड इतनी नहीं है। धीरे-धीरे बहुत सी तरहों से सोचने लगा हूँ। कई बातें लगातार चलती रहती हैं। पीछे लगतार अपने लिखने पर सोचता रहा। एक बार, दो बार, तीन बार । पर कहीं भी पहुँच न सका। ख़ुद की बुनावट में कई चीज़ें इस तरह गुंफित हैं कि वह इतना आसान ल...
Shachinder Arya
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वहीं हैं, जहाँ हम थे। यहीं अपनी दिल्ली में। कहीं गए नहीं हैं। जिसका अपना कोई मौसम नहीं। जिसकी जमा पूँजी अब सालभर गरमी ही रह गयी है। किसी काम लायक नहीं छोड़ती। अलसाए से दिन। उतनी ही बोझिल-सी रातें। बीच में शामें तपते सूरज से बचाती कम, उमस में लिपटे तौलिये जैसे निचोड़त...
Shachinder Arya
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दिन पता नहीं कैसे बीतते जा रहे हैं। करने को कुछ है ही नहीं जैसे। खाली से। ठंडे से। दिन अब छोटे होने लगे हैं। तीन बजने के साथ जैसे गायब से। उबासी नींद के साथ बुलाती है। पर नाम नहीं करता। रज़ाई ठंड से भी ठंडी कमरे में पड़ी रहती है। पैर भी ठंडे रहने लगे हैं। फ़िर नीचे सा...
Shachinder Arya
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पता नहीं कैसे अजीब से दिन हैं। बिलकुल ठहरे से। उदास से। बेतरतीब। कहीं कोई मुस्काता बहाना भी नहीं। इतना लिखकर मन कर रहा है लैपटाप बंद कर थोड़ी देर सो जाऊँ। मन खाली-खाली सा है। पता नहीं यह कैसा भाव है। कैसा करता जा रहा है। शनिवार से भूख कम हो गयी है। खाने का मन नहीं क...