ब्लॉगसेतु

PRABHAT KUMAR
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बीते दिनों को याद करोमगर विपदाओं का त्याग करोहुनर सीखे होगे अद्भुतनव वर्ष पर इस्तेमाल करोमन में ज्योति जला लोहवा को साथ मिला लोफफके न दर्द से कभीऐसे दिल का ख्याल करोबीते..कोई शत्रु नहीं है जीवन काआपसी भाईचारा बनी रहेस्मृतियों की छाया में हो जबसकारात्मक तथ्यों से बा...
Shachinder Arya
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कभी-कभी ख़ुद को दोहराते रहा चाहिए। अच्छा रहता है। गहराई नापते रहो। इसका अंदाज़ा बहुत ज़रूरी है। पता रहता है, हम कहाँ से चले थे और आज कहाँ है। बड़े दिनों से सोच रहा था, कहाँ से शुरू करूँ। मन में एक ख़ाका घूमते-घूमते थक गया। बस हरबार यही सोचता रहा, कैसे दिन हुआ करते थे।...
Shachinder Arya
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इधर सोचने बहुत लगा हूँ। पुराने दिनों पर घंटों सोचते हुए हफ़्तों बिता सकता हूँ। इतने दिन बिता देने की यह काबिलियत मुझमें अचानक घर नहीं कर गयी। यह मेरे ख़ून में है। क्योंकि मेरे ख़ून में इस मिट्टी की हवा नहीं है। पानी भी नहीं है। कुछ भी नहीं है। जिस-जिस के ख़ून में यहाँ...
Shachinder Arya
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जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है,  हम वापस अपने अंदर लौटने लगते हैं जैसे। जैसे कहीं अनजानी जगह फँसे रहने का एहसास अंदर-ही-अंदर चुभता रहता है। कोई बहाना होता, जो वापस ले जाता। पर बहाना ऐसा, जब हम खुश हो सकें। खुश होकर ख़ुद को देख सकें। ऐसा न हो जब हम लौटकर वापस...
Shachinder Arya
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शहरों में जो लोग अपने सपनों के साथ दाखिल होते हैं, कभी कोई उनसे उनके सपनों के बारे में नहीं पूछता। उन्हे कहीं कोई ऐसा भी नहीं मिलता, जो उन अधूरे सपनों को किसी किताब में लिखकर, किसी जगह कतरन बनाकर लिख अपने पास रख ले। कभी कोई होता, जो उस किताब को पढ़कर अपने जैसे सपने...
Shachinder Arya
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बचपन की यादों में सबसे अनछुई याद है नानी के घर की। हमलोग इसी मौसम में झुलसती गरमियाँ अपने गाँव में बिताने हरसाल लौट आते। वहाँ हमें छोड़कर सब रहा करते। वहाँ बस, हम ही नहीं हुआ करते। पता नहीं हम कितने छोटे रहे होंगे जब पापा हीरो मजेस्टिक खरीदकर लाये। शायद मेरे मुंडन क...
Shachinder Arya
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पता नहीं क्या लिखने बैठा हूँ। पर बैठ गया हूँ। शायद कुछ और बातें होंगी, जो कभी इस दुमाले से नीचे नहीं उतर पायीं। फ़िर बकवास करने में भी हम खुद को इतना तो मान ही लेते हैं कि किसी को कुछ नहीं समझते। खुद को भी नहीं। वह शादी करने के बाद उस मेहनतकश जानवर के सींग की तरह गा...
Shachinder Arya
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कानपुर कभी किसी याद का हिस्सा नहीं रहा। सिर्फ़ एक छोटी-सी धुँधली तस्वीर में दादी के चले जाने के बाद, रात दो बजे कानपुर से लखनऊ की तरफ़ भागती रोडवेज़ बस में बोनट पर गुजरी असहाय यात्रा के कुछ याद नहीं। उसमें कानपुर कहीं नहीं है। सिर्फ़ लंबी काली सड़कें, घूमते पहिये और चमक...
Abhishek Kumar
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जो लड़का देखता थावो दिसम्बर की एक सर्द सुबह थी. जिधर देखो घना कोहरा...लड़के ने खिड़की से बाहर झाँका और खुश हो गया. उसक पसन्दीदा वातावरण था. टी.वी की न्यूज़ एंकर लाख कहती रहे, घने कोहरे से जनजीवन अस्त-व्यस्त, लड़के की दिली तमन्ना थी कि आने वाले दो-तीन दिन यूँ ही रहें...घ...
शिवम् मिश्रा
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प्रिये ब्लॉगर मित्रोंसादर प्रणामहाज़िर है एक और रचना आज के बुलेटिन में | यादें बेहद दुःख भी दे सकती हैं और सुख भी | मेरे बचपन के कारनामो और दोस्तों की यादों ने हमेशा मुझे हंसाया और गुदगुदाया ही है | आपके सामने उन्ही यादों को एक कविता के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ...