ब्लॉगसेतु

Shachinder Arya
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मन भाग रहा है। पता नहीं क्या है, जिसके न होने से लिख नहीं पा रहा। अजीब-सी स्थिति है। कभी मन करता है, एक एक अधूरी पोस्ट खोलकर उसे पूरा करता जाऊँ। पर नहीं कर पाया। वहाँ से वर्ड में लिखने बैठा हूँ तो अब बाहर निकल कर घूम आने को जी चाह रहा है। शुक्रवार शाम पौने सात बजे...
Shachinder Arya
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रात साढ़े दस बजे के बाद। छत पर टहलते हुए। एक हाथ से कान पर फ़ोन। दूसरे से नाक पोंछते हुए। दिल्ली की ठंड ऐसे ही हरबार इन दिनों में घेर लेती। इस बार भी कश्मीर में बर्फ़ गिरने के बाद से बढ़ गयी। वापस कमरे में लौट कर सोच रहा हूँ एक ख़त लिखने बैठ जाऊँ। तुम्हारी बहुत याद आ र...
Shachinder Arya
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उस वक़्त उसकी काँख में कोई बाल नहीं था, जब पहली बार उसने उसे वहाँ चूमने के साथ अपनी दूसरी प्रेमिका की याद को विस्मृत करते हुए वह तस्वीर खींची थी। दोनों अभी एक-दूसरे के लिए नए-नए साथी बने हैं। वह अकसर अपनी सहेलियों से सुनती रहती। लड़कियों का ‘सेफ़ डिपॉज़िट’। वह उसकी एफ़ड...
Shachinder Arya
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कभी-कभी हम नहीं जानते हम क्यों डूब रहे हैं। बस हम डूबना जानते हैं। आहिस्ते से इस पते पर रुक गयी एक नज़र उन सारे दिनों में पीछे ले जाने के लिए काफ़ी होती होगी, जब वह मुझ इस तरह ‘नॉन सीरियस’ से दिखने वाले लड़के में दिख जाने वाली सारी खूबियों को किन्हीं और अर्थों में बदल...
Shachinder Arya
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सपना। इस एक शब्द में ऐसी दुनिया है, जहाँ हम सब चले जाना चाहते हैं। कोई भी ऐसा टुकड़ा जो हमें अपनी तरफ़ चुंबक की तरह खींचता रहता है। खींचना शहद की तरह मधुमक्खी का भी होता है और उस छोटे नवजात बच्चे का अपनी असहाय लेटी कमज़ोर माता की तरफ़ भी। जैसे गाडियाँ खींची चली आती हैं...
Shachinder Arya
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कहीं कोई होगा, जो इस मौसम की ठंडक को अपने अंदर उतरने दे रहा होगा। कोई न चाहते हुए भी ऐसा करने को मजबूर होते हुए खुद को कोस रहा होगा। दुनिया में इन दो तरह के लोगों के अलावे भी कई और शैदाई होंगे, जो उन सड़कों, गलियों, अनदिखे मोड़ों पर रुककर, किसी अनजाने एहसास का इंतज़ार...
Shachinder Arya
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कभी-कभी सोचता हूँ हम भाग कर शादी कर लेते तो क्या होता? मेरे पास आज तक नौकरी नहीं है। इन दोनों बातों में प्रश्न-उत्तर वाला संबंध नहीं है फ़िर भी दोनों एक-दूसरे का जवाब हैं। यह दोनों बातें आपस में ऐसे गुथी हुई हैं, जैसे तुम्हारी कल शाम वाली बँधी चोटियाँ। उनमें गुथे हु...
Shachinder Arya
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कल रात इस ख़याल के दिल में उतरते जाने की देर थी कि नींद फ़िर लौट के नहीं आई। उस दृश्य को अपने सामने घटित होते देखता हूँ तो रौंगटे खड़े हो जाते हैं। रात ऐसे ही कई बार गिरफ़्त में ले लेती है। फ़िर छोड़े नहीं छोड़ती। गुप्ता जी वहीं कहीं सड़क किनारे ख़ून से लथपथ पड़े रह गए हों...
Shachinder Arya
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खिड़कियों पर पर्दे डालकर इस लाल अँधेरे में बैठे बहुत देर से सोच रहा हूँ। कई सारी बातें चलकर थक चुकी हैं। कुछ मेरे बगल ही बैठी हैं। कुछ सामने एक बंद किताब की ज़िल्द के अंदर छिपी हुई हैं। डायरी लिखना एक दम बंद होने की कगार पर है। लिखने का मन होते हुए भी पूरे दिन की भाग...
Shachinder Arya
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जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है,  हम वापस अपने अंदर लौटने लगते हैं जैसे। जैसे कहीं अनजानी जगह फँसे रहने का एहसास अंदर-ही-अंदर चुभता रहता है। कोई बहाना होता, जो वापस ले जाता। पर बहाना ऐसा, जब हम खुश हो सकें। खुश होकर ख़ुद को देख सकें। ऐसा न हो जब हम लौटकर वापस...