ब्लॉगसेतु

डा. सुशील कुमार जोशी
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लिखना जरूरी है तरन्नुम में मगर ठगे जाने का सारा बही खाता हिसाब कौन जानता है सुर मिले और बन पड़े गीत एक धुप्पल में कभी यही बकवास आज ही के दिन हर साल ठुमुकता चला आता है पुराने कुछ सूखे हुऐ घाव कुरेदने फिर एक बार ये अहसासभूला जाता है ताजिंदगी ठगना खुदा तक को&...
डा. सुशील कुमार जोशी
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बरसों लकीर पीटना सीखने के लिये लकीरें समझने के लिये लकीरें कहाँ से शुरु और कहाँ जा कर खतम समझ लेना नहीं समझ पाना बस लकीरें समझते हुऐ शुरु होने और खतम होने का है बस वहम और वहम जो घर में है जो मोहल्ले में है जो शहर में है वही सब हर जगह में है और वही हैं सब के रहम-ओ-क...
डा. सुशील कुमार जोशी
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किसी को लग पड़ कर कहीं पहुचाने की बात करेंरास्ते काम चलाऊ उबड़ खाबड़ बनाने की बात करेंकौन सा किसी को कभी कहीं पहुँचना होता है पुराने रास्तों के बने निशान मिटाने की बात करेंबात करने में संकोच भी नहीं करना होता है पुरानी किसी बात को नयी बात पहनाने की बात करेंबात है कि छ...
डा. सुशील कुमार जोशी
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डूबेगी नहीं पता है डुबाने वाला पानी ही बहुत बेशरम है बैठे हैं डूबती हुई नाव में लोग हर चेहरे पर फिर भी नहीं दिख रही है कोई शरम है पानी नाव में ही भर रहा है नाव वालों के अपने भी करम हैं डुबोने वाले कोतैरने वालों के भी ना जाने क्यों डूब जाने का भरम है अच्छाई से...
डा. सुशील कुमार जोशी
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शायद पता नहीं होता हैदूर देखने की आदत नहीं डाल रहा होता है देख भी नहीं रहा होता है गिद्ध होने का बहुत ज्यादा फायदा हो रहा होता है आस पास के कूड़े कचरे को सूँघता हीफिर रहाहोता है खुश्बुओं की बात कभी थोड़ी सी भी नहीं कर रहा होता है लाशों के बारे में सोचता फिर रहा होता...
डा. सुशील कुमार जोशी
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छोटे छोटे अपने आस पास के उलझे प्रश्नों से उलझते उलझते हमेशा उलझ जाने वाले को सुलझने सुलझाने के सपने देख लेने की आदत डाल लेनी ही चाहिये बड़े देश के बड़े प्रश्नों को उठाने वालों को थोड़ी सी ही सही शरम तो आनी ही चाहिये अच्छा होता है प्रेस काँफ्रेंस के उत्तरों को सुन कर म...
डा. सुशील कुमार जोशी
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अखबार खरीद कर रोज घर लाने की आदत पता नहीं किस दिन तक यूँ ही आदत में शामिल रहेगी पहले दिन से ही पता रहती है जबकि कल किसकी कबर की खबर और किस की खबर की कबर बनेगी मालूम रहता है आधा सच हमेशा आधे पन्ने में लिख दिया जाता है वैसे भी पूरी बात बता देने से बात में मजा भी कहाँ...
डा. सुशील कुमार जोशी
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लिखने लिखाने के विषयों पर क्या कहा जा सकता है कुछ भी कभी भी खाली दिमाग को फ्यूज होते बल्ब के जैसे चमका सकता है कभी घर की एक बात उठ सकती हैं कभी पड़ोसी का पड़ोसी से पंगा एक मसालेदार मीनू बना सकता है काम करने की जगह पर एक नहीं कई पाकिस्तान बनते बिगड़ते ही हैं रोज का रोज...