ब्लॉगसेतु

गायत्री शर्मा
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संगीत सम्राट मोहम्मद रफी की तारीफ में कुछ कहना सूरज को रोशनी दिखाने के समान है। गायन के क्षेत्र में रफी का जो कद है, उसे छू पाना भी आज के दौर के किसी गायक के बस की बात नहीं है। रफी अपने गीतों में जो सालों पहले गुनगुना कर कह गए, वह आज भी ताज़ा तरीन सा लगता है। दिल क...
गायत्री शर्मा
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नौशाद साहब के दरवाजे पर गायिका बनने की गुजारिश के साथ अचानक से दस्तक देने वाली 13 वर्षीय उमा के लिए संगीत की दुनिया के इस अज़ीज फ़नकार के रहमो-करम की इनायत मिलाना खुदा की किसी नैमत से कम नहीं था। बड़ी उम्मीदों के साथ कुछ कर दिखाने का ज़ज्बा लिए उत्तर प्रदेश से मुबं...
अविनाश वाचस्पति
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दिल्‍ली और गुजरात में पूरा आठ पेज का फुल साइज अखबार मात्र 6 रुपये प्रति अंक मिल रहा है। सहनशील और जिज्ञासु यहीं पर डाउनलोड करके पढ़ सकते हैं। मास्‍टर और पंडित इसी श्रेणी में आते हैं। वे न हींग लगाते हैं और न फिटकरी, न हींग बालों पर और न फिटकरी गालों पर। जबकि जानते...
अविनाश वाचस्पति
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 परदा फटे बिना हीरो निकल आता है, हीरोइन निकल आती है, चरित्र अभिनेता, खलनायक और आइटम सांग्स  की भरपूर खेप के आने और गाए जाने गीत और उन पर अभिनय करने वाले कॉमेडियन निकल आते हैं बल्कि खूब हंसाते हैं। जब इतना सब बड़े परदे पर हो जाता है और परदा साबुत रहता है।...
अविनाश वाचस्पति
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माउस से इमेज पर क्लिक कीजिएक्लिक करने पर भी न पढ़ा जाए तो ... थोड़ा नीचे उतरिएफिल्मों से रुपये का बाह्य संबंध, रुपये और गर्मी के गहरे अंतर्संबंधों से अधिक विकसित रूप में समाज में अपनी पैठ बना चुका है। कभी सोचा है कि जिसकी जेब में रुपया होता है, उसे गर्मी क्यों लगती...
अविनाश वाचस्पति
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इमेज डाउनलोड करके पढ़ सकते हैं। कठिनाई न हो इसके लिए टैक्‍स्‍ट भी नीचे लगाया गया है : सच्चाई की ताकत कलाकार को शिखर तक ले जाती है : आलोक भारद्वाजडीडी नेशनल पर प्रसारित चर्चित धारावाहिक धारावाहिक ‘‘सुकन्या हमारी बेटियाँ‘‘ से बतौर अभिनेता अपने कैरियर की शुरुआत करके आ...
अविनाश वाचस्पति
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मेरे पास मजदूर मां है-    अविनाश वाचस्पति‘’तुझको नहीं देखा हमने कभी/पर इसकी जरूरत क्या होगीऐ मां तेरी सूरत से अलग/भगवान की सूरत क्या  होगी ‘’वर्ष 1968 में प्रदर्शित ‘दादी मां’ फिल्म का यह गीत मां की महिमा बखान देता है पर आज हालात खतरनाक हो चुके हैं।...
अविनाश वाचस्पति
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अविनाश वाचस्पति
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‘मैं क्या करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया’। फिल्म में कलाकार का किरदार एक बुड्ढे का भी और कॉमेडियन का भी। कहां बुढ़ापे के बोर नीरस जीवन के साथ कॉमेडी का भरपूर जलवा। यह फिल्मों  में ही संभव है। फिल्म  में वह सब संभव है जो साहित्य में असंभव है। साहित्य  त...
अविनाश वाचस्पति
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फिल्म के परदे पर डर देखकर डर गए तो जीत गया निर्माता, जीत गया निर्देशक, चमकने लगे सितारे। सब दर्शक को डराना चाहते हैं। कोई कब्रिस्तान दिखाता है, कोई श्मशान में टहलाता है, नरमुंड की माला पहनाता है, कंकाल चमकाता है, कोई रात में सड़क पर घुमाता है, दर्शक भी डरना चाहता ह...