ब्लॉगसेतु

समीर लाल
76
बाजार जाता हूँ तो देख कर लगता है कि जमाना बहुत बदल गया है. साधारण सी स्वभाविक बातें भी बतानी पड़ती है. कल जब दही खरीदने लगा तो उसके डिब्बे पर लिखा था कि यह पोष्टिक दही घास खाने वाली गाय के दूध का है. मैं समझ नहीं पाया कि इसमें बताने जैसा क्या है? गाय तो घास ही खाती...
समीर लाल
76
बचपन में वह बदमाश बच्चा था. जब बड़ा हुआ तो गुंडा हो गया. और बड़ा हुआ तो बाहुबली बना. फिर जैसा कि होता है, वह विधायक बना और फिर मंत्री भी. नाम था भगवान दास.रुतबे और कारनामों की धमक ऐसी कि पुलिस भी काँप उठे. कम ही होते हैं जो इस कहावत को धता बता दें कि पुलिस से बड़ा कौन...
rashmi prabha
92
सात समंदर पार ... मेरी अम्मा स्व सरस्वती प्रसाद जी की कलम का जादू है । बचपन के खेल, परतंत्र राष्ट्र के प्रति उनके वक्तव्य उनकी कल्पना को उजागर करते हैं ।यह कहानी मैंने कितनी बार पढ़ी, कितनों को सुनाई ... मुझे ख़ुद याद नहीं... लेकिन जितनी बार इस कथा-यात्रा से गुज़री ,...
समीर लाल
76
बहुत सूक्ष्म अध्ययन एवं शोध के बाद लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि यदि आपके नाम के अन्त में आ की मात्रा लगाने के बाद भी नाम आप ही का बोध कराये तो आप अन्तरराष्ट्रीय स्तर के हो सकते हैं.जैसे उदाहरण के तौर पर लेखक का नाम समीर है. यदि आपको समीर नाम सुनाई या दिखाई पड़े...
समीर लाल
323
बहुत सूक्ष्म अध्ययन एवं शोध के बाद लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि यदि आपके नाम के अन्त में आ की मात्रा लगाने के बाद भी नाम आप ही का बोध कराये तो आप अन्तरराष्ट्रीय स्तर के हो सकते हैं.जैसे उदाहरण के तौर पर लेखक का नाम समीर है. यदि आपको समीर नाम सुनाई या दिखाई पड़े...
rashmi prabha
92
टिकोले में नमक मिर्च मिलातीवह लड़कीसोलह वर्ष के किनारे खड़ीअल्हड़ लहरों के गीत गाती थी !भोर की पहली किरण के संगजागी आँखों में,उसके सपने उतरते थेएक राजकुमारकभी किसान सा,कभी कुम्हार सा,कभी समोसे लिए,कभी मूंगफली,कभी चेतक घोड़े पर,कभी वर्षों से सोई अवस्था में,कभी राक्षस को...
Yashoda Agrawal
3
कमी न तुममें थीन मुझमें थी,और शायद कमी तुझमें भी थी,मुझमें भी थी ...कटु शब्द तुमने भी कहे,हमने भी कहे,मेरी नज़रों से तुम गलत थे,तुम्हारी नज़रों से हम !बना रहा एक फासला,न तुम झुके,न हम - शिकायतें दूर भी हों तो कैसे ?आओ, चुपचाप ही सही,कुछ दूर साथ चलें,मुमकिन है थक...
rashmi prabha
92
दिल कर रहा है,मन की तमाम विपरीत स्थितियों से,खुद को अपरिचित कर लूँ,बैठ जाऊँ किसी नदी के किनारेऔर पूछूं,मछली मछली कितना पानी ।नदी में पैर डालकर छप छप करूँ,कागज़ की नाव में रखकर कुछ सपनेनदी में डाल दूँ,देखती रहूँ उसकी चालतबतक,जबतक वह चलने का मनोबल रखे !डूबना तो सबको ह...
डा. सुशील कुमार जोशी
23
कुछ हंसते हंसते कुछ रो धो कर अपना घर अपनी दीवार रहने दे सर मत मार अपनी गाय अपनी गाय का अपना गोबरगोबर के कंडे खुद ही बनाये गये अपने ही हाथों से हाथ साफ धोकरअपना ही घर अपने ही घर की दीवारकंडे ही कंडेअप...
Krishna Kumar Yadav
132
हिंदी को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में लखनऊ की संस्था परिकल्पना का अहम स्थान है।  विश्व के 11 देशों में  ‘‘ब्लॉगोत्सव‘‘ और ‘‘अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी उत्सव‘‘ का आयोजन कर चुकी यह संस्था हिन्दी भाषा को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप देने की दिशा में बड़ा काम कर रही ह...